वनस्पतियां

 

   वनस्पतियां

 

भारत दुनिया के 12 विशाल जैव-विविधता वाले देशों में से एक है। लगभग 47000 पौधों की प्रजातियों के साथ, भारत विश्व  में दसवें स्थान पर और एशिया में चौथे स्थान पर है। भारत में लगभग 15000 फूलों की‌ प्रजाति के पौधे हैं, जो दुनिया के कुल फूलों के पौधों का  6% हैं। देश में कई गैर-फूल वाले पौधे भी हैं, जैसे फ़र्न, शैवाल और कवक। भारत में जानवरों की लगभग 90000 प्रजातियां हैं, साथ ही, इसके ताजे और समुद्री जल में विभिन्न प्रकार की  मछलियों की प्रजातियां भी पाई जाती हैं| प्राकृतिक वनस्पति एक पादप समुदाय को संदर्भित करती है, जो प्राकृतिक रूप से मानव सहायता के बिना विकसित होती है और  जो लंबे समय तक मनुष्यों द्वारा अबाधित छोड़ दी गयी हो |  इसे  प्राकृतिक वनस्पति (virgin vegetation ) कहा जाता है। इस प्रकार, कृषि -फसलें,  फल, बाग-बगीचे वनस्पति का हिस्सा तो हैं, लेकिन ये  प्राकृतिक वनस्पति नहीं हैं । वनस्पति (flora)  शब्द का उपयोग किसी विशेष क्षेत्र या अवधि के पौधों को निरूपित करने के लिए किया जाता है। इसी प्रकार, जानवरों की प्रजातियों को प्राणी जात  वर्ग के रूप में जाना जाता है। पादप और प्राणी वर्गों मे  यह  विविधता निम्न कारकों के कारण है।

   वर्षा  का वितरण

भारत में वर्षा मौसमी, अनिश्चित और असमान रूप से वितरित होती है। अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून अवधि के दौरान होती है। वर्षा बहुत अधिक या बहुत कम हो सकती है। बीच-बीच में लम्बीं अवधि के शुष्क काल भी होते हैं। वर्षा की मात्रा के आधार पर, हम भारत को पाँच प्रमुख वर्षा क्षेत्रों में विभाजित कर सकते हैं।

  1. अति निम्न वर्षा वाले क्षेत्र (प्रति वर्ष 40 सेमी से कम)- काराकोरम पर्वतमाला, उत्तरी कश्मीर और कच्छ और राजस्थान (थार रेगिस्तान) के पश्चिमी भाग अति निम्न वर्षा वाले क्षेत्रों के अंतर्गत आते हैं ।
  2. निम्न वर्षा वाले क्षेत्र (प्रति वर्ष 40 सेंटीमीटर से 60 सेंटीमीटर)- इसके अंतर्गत जास्कर श्रेणी, पंजाब और हरियाणा, मध्य राजस्थान, पश्चिमी गुजरात के कुछ हिस्सों और पश्चिमी घाट के वृष्टि छाया क्षेत्र सम्मिलित हैं ।
  3. मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (60 सेंटीमीटर से 100 सेंटीमीटर प्रति वर्ष)- इसके अंतर्गत निम्न वर्षा और उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों को छोड़कर भारत का एक बड़ा भाग सम्मिलित है |
  4. उच्च वर्षा वाले क्षेत्र (100 सेंटीमीटर से 200 सेंटीमीटर प्रति वर्ष)- इसके अंतर्गत चार भिन्न-भिन्न क्षेत्र सम्मिलित हैं,  जिसमें पश्चिमी तट का एक संकीर्ण  क्षेत्र, पूर्वी तटीय क्षेत्र, हिमालय की तलहटी और उत्तर-पूर्वी भारत का एक भाग  शामिल है।
  5. अति उच्च वर्षा वाले क्षेत्र (प्रति वर्ष 200 से अधिक सेमी)- इसके अंतर्गत पश्चिमी घाट के पश्चिमी किनारे, हिमालय की तलहटी, मेघालय पठार (शिलांग पठार) और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सम्मिलित हैं। मेघालय पठार में मासिनराम में 1141 सेंटीमीटर वर्षा दर्ज की गई है,  जो भारत / विश्व में सबसे अधिक  वर्षा ( वार्षिक) प्राप्त करता है।

वर्षा की परिवर्तनशीलता ( rainfall variability)

भारत में वर्षा की एक विशेषता ,इसकी परिवर्तनशीलता है। निम्नलिखित सूत्र की सहायता से वर्षा की परिवर्तनशीलता की गणना की जाती है:

  • ‘भिन्नता गुणांक’ के मान वर्षा के ‘माध्य मानों ‘के साथ परिवर्तन दर्शाते हैं। कुछ स्थानों पर वास्तविक वर्षा 20-50% तक परिवर्तनशील होती है।
  • पश्चिमी तटों, पश्चिमी घाट, उत्तरपूर्वी प्रायद्वीप, गंगा के पूर्वी मैदान, उत्तरपूर्वी भारत, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर 25% से कम की परिवर्तनशीलता  होती  है। इन क्षेत्रों में 100 सेमी से अधिक की वार्षिक वर्षा होती है।
  • 50% से अधिक की परिवर्तनशीलता राजस्थान के पश्चिमी भाग, जम्मू और कश्मीर के उत्तरी भाग और दक्कन के पठार के आंतरिक भागों में होती है। इन क्षेत्रों में 50 सेमी से कम की वार्षिक वर्षा होती है।
  • शेष भारत की परिवर्तनशीलता 25-50% है और इन क्षेत्रों में 50 -100 सेमी के मध्य वार्षिक वर्षा होती है।

 वर्षा की तीव्रता

  • निम्न वर्षा वाले क्षेत्रों की तुलना में उच्च  वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक सघन वनस्पति पाई जाती  है।

 तापमान और आर्द्रता

  • तापमान और आर्द्रता प्रमुख कारक हैं जो वनस्पति के प्रकृति और विस्तार को निर्धारित करते हैं।
  • उदाहरण के लिए, उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्र सदाबहार वन के अनुकूल होते है, जबकि उच्च तापमान और कम आर्द्रता वाला क्षेत्र कांटेदार झाड़ियों (रेगिस्तान) के अनुकूल होते है।

एक क्षेत्र की वनस्पति प्रकार पर, तापमान और वार्षिक वर्षा के संयुक्त प्रभाव को समझने के लिए निम्नलिखित रेखा चित्र को देखें:

सूर्य  की रोशनी

  • अक्षांश, ऊंचाई, मौसम और दिन की अवधि में अंतर के कारण विभिन्न स्थानों पर सूर्य की रोशनी या दिन की अवधि में भिन्नता पाई जाती है ।
  • सूर्य के प्रकाश की लंबी अवधि के कारण, गर्मियों में वृक्ष तेजी से बढ़ते हैं।

तुंगता (altitude )

  • अक्षांश, या भूमध्य रेखा से दूरी, एक क्षेत्र की जलवायु और मौसम को अधिक प्रभावित करता है। यदि आप भूमध्य रेखा के नजदीक जाते हैं, तो जलवायु गर्म होगी , जबकि भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ने पर ठंडी जलवायु होगी| किसी स्थान कि तुंगता और समुद्र सतह  से ऊंचाई  का प्रभाव  उस स्थान की जलवायु पर  एकसमान  होता है – जितनी ऊंचाई  में परिवर्तनशीलता होगी उतनी  ठंडी जलवायु होगी।
  • वनस्पति आंशिक रूप से ऊंचाई द्वारा निर्धारित होती है। जबकि अधिकांशतः वनस्पति तापमान और वर्षा द्वारा निर्धारित होती है और तुंगता(ऊंचाई ) का तापमान और वर्षा की तीव्रता दोनों पर प्रभाव पड़ता है ।
  • जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, तापमान कम होता जाता है। यह हमारे बायोम की संरचना और संघटक को बदल देती है। उदाहरण के लिए, नीचे दी गयी चित्र में,  हम देख सकते हैं कि जैसे-जैसे ऊंचाई में वृद्धि हो रही है वैसे वैसे वनस्पति में भी भिन्नता दिखाई दे रही है और  जो अंततः  धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है ।
  • वर्षा की तीव्रता और ऊँचाई में जटिल संबंध है। उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्रायः वर्षा के स्थान पर बर्फबारी होती हैं क्योंकि वहां तापमान कम होता है। पर्वत के  एक किनारे पर नमी उपस्थित होती है, जिससे इस क्षेत्र में वर्षा अधिक होती है लेकिन पर्वत के विपरीत किनारे में हवा में नमी की अनुपस्थिति के कारण  वर्षा  कम होती है।  स्पष्टीकरण के लिए नीचे दी गई छवि देखें।
  • इस प्रकार तुंगता (altitude), तापमान और वर्षा दोनों को प्रभावित करती है जो अंततः बायोम की संरचना को निर्धारित करेगी।
  • अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट  पहले भूगोलवेत्ता थे,  जिन्होंने  वनस्पति और तुंगता के बीच संबंध को मान्यता दी थी।

बायोम:- प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले  वनस्पतियों और जीवों के समुदाय का एक प्रमुख निवास स्थान है, जैसे कि वन।

भूमि

  • वनस्पति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भूमि की प्रकृति से प्रभावित होती है।
  • उदाहरण के लिए, पर्वतीय क्षेत्रों में वनस्पति का प्रकार पठारी और मैदानी क्षेत्रों की तुलना में भिन्न होता है।
  • उपजाऊ भूमि का उपयोग आम तौर पर कृषि के लिए किया जाता है, जबकि असमतल और उबड़-खाबड क्षेत्र में  घास के मैदान और वन – क्षेत्र हैं जो विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों को आश्रय प्रदान करते  हैं।

मिट्टी

  • विभिन्न प्रकार की मिट्टी विभिन्न प्रकार की वनस्पति में मदद करती है।
  • रेगिस्तान की रेतीली मिट्टी कैक्टस और कंटीली झाड़ियों के अनुकूल करती है जबकि गीली, दलदली, डेल्टाई मिट्टी मैंग्रोव और डेल्टा वनस्पति का समर्थन करती है।
  • मिट्टी की गहराई वाले पहाड़ी ढलानों में शंकुधारी पेड़ हैं।

 

भारत में वनस्पति के प्रकार

 

नम उष्णकटिबंधीय वन

  • उष्णकटिबंधीय नम सदाबहार
  • उष्णकटिबंधीय अर्ध सदाबहार
  • उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती
  • तटीय और दलदली

 शुष्क उष्णकटिबंधीय वन

  • उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार
  • उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती
  • उष्णकटिबंधीय कांटेदार

 

उपोष्ण कटिबंधीय पर्वतीय  वन

  • उपोष्ण कटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले पर्वतीय वन
  • उपोष्णकटिबंधीय नम पर्वतीय वन (देवदार)
  • उपोष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार पर्वतीय वन

 पर्वतीय समशीतोष्ण वन

  • पर्वतीय नम समशीतोष्ण वन
  • हिमालयन नम समशीतोष्ण वन
  • हिमालयन शुष्क समशीतोष्ण वन

वितरण

  • पश्चिमी घाट का पश्चिमी भाग (समुद्र तल से 500 से 1370 मीटर की ऊंचाई पर)।
  • पूर्वांचल पहाड़ियों के कुछ क्षेत्र।
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में।

वातावरणीय  परिस्थितियाँ

  • छोटे शुष्क मौसम के साथ 250 सेमी से अधिक की वार्षिक  वर्षा होती है।
  • वार्षिक तापमान 25 ° -27 ° C के मध्य होता है।
  • औसत वार्षिक आर्द्रता 77% से अधिक होती है।

विशेषताएँ

  • इन वनों के वृक्ष तेज गर्मी और अधिक आर्द्रता के कारण अपने पत्ते एक साथ नहीं गिराते ।
  • इस जलवायु के पौधे  समोद्भदीय  (Mesophitic) होते  हैं जो  न तो  शुष्क और न ही  नम प्रकार की जलवायु की अनुकूलता ग्रहण करते हैं।
  • ऊंचाई: पेड़ों की ऊँचाई प्रायः 45-60 मीटर तक होती है।
  • उष्णकटिबंधीय वर्षा वन ऊपर से छतरी (canopy) की तरह दिखाई देते हैं | इसमें केवल तभी अंतराल होता  है जब इससे या तो  बड़ी नदियां  गुजरती हैं  या फिर कृषि के लिए इसकी सफाई की जाती  है।
    • मोटी छतरी (canopy) के कारण सूर्य की रोशनी प्रायः भूमि तक नहीं पहुंचती , जिसके परिणाम स्वरूप छोटे पौधों की कम वृद्धि होती है। यह मुख्य रूप से बांस, फर्न, लताएँ, ऑर्किड, आदि से बना है।
  • सभी पौधे सूर्य की रोशनी के लिए ऊपर की ओर (अधिकांश एपिफाइट्स) बढ़ने का प्रयास करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक विशेष परत की व्यवस्था होती है। ऊपर से देखने पर पूरी आकृति (morphology) एक हरे रंग की कालीन जैसी दिखती है।

लकड़ी (timber )

  • इन वनों की लकड़ी टिकाऊ और कठोर (hardwood) होती हैं ।
  • इनका  उच्च वाणिज्यिक मूल्य होता है, , लेकिन उच्च घनत्व और परिवहन सुविधाओं के अभाव के कारण इनका  दोहन करना दुष्कर है।
  • इन वनों की महत्वपूर्ण प्रजातियाँ-महोगनी, मेसुआ, सफेद देवदार, जामुन, बेंत, बाँस आदि हैं।

उष्णकटिबंधीय अर्ध सदाबहार वन

  • ये उष्णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार वनों और उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों के मध्य स्थित माध्यमिक ( transitional forest) वन हैं।
  • वे उष्णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार वनों की तुलना में शुष्कता वाले क्षेत्र हैं

जलवायुपरिस्थितियाँ

  • वार्षिक वर्षा 200-250 सेमी के मध्य होती है।
  • औसत वार्षिक तापमान 24 डिग्री सेल्सियस से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है।
  • सापेक्ष आर्द्रता लगभग 75% होती है।
  • शुष्क मौसम उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों की तुलना में अधिक है।

वितरण

  • पश्चिमी तट
  • असम
  • पूर्वी हिमालय की निचले ढलान वाले क्षेत्र
  • ओडिशा और अंडमान।

विशेषताएँ

  • अर्द्ध सदाबहार वन कम सघन होते हैं और आर्द्र सदाबहार वनों की तुलना में अधिक घने (झुंड या कॉलोनियों में  ) होते हैं।
  • इन जंगलों में कई प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • वृक्षों के साथ अत्यधिक मात्रा में अधिपादपों  के साथ  आश्रय देते तनें  होते हैं।
  • महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं: –
    • पश्चिमी घाट में रोज़वुड, मेसुआ, लॉरेल, कांटेदार बांस
    • हिमालयी क्षेत्र में सफेद देवदार, आम, भारतीय चेस्टनट, चम्पा, आदि।

लकड़ी

  • इसकी  लकड़ी भी उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों की तरह कठोर होती है , सिवाय इसके कि ये वन ऊँचे  होने के साथ-साथ कम घने होते हैं (यहाँ लकड़ी उद्योग सदाबहार वनों की तुलना में बेहतर है)।

उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन वितरण

  • ये सदाबहार वनों से घिरे पश्चिमी घाट के साथ -साथ पाए जाते हैं।
  • तराई और भाबर क्षेत्र सहित शिवालिक श्रेणी की एक पट्टी।
  • मणिपुर और मिजोरम के क्षेत्र।
  • पूर्वी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की पहाड़ियाँ, छोटा नागपुर का पठार, ओडिशा का अधिकांश भाग, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।

 जलवायु  परिस्थितियाँ

  • वार्षिक वर्षा 100 से 200 सेमी के मध्य होती है।
  • औसत वार्षिक तापमान लगभग 27 ° C होता है।
  • औसत वार्षिक सापेक्ष आर्द्रता 60-75% के मध्य होती है।
  • वसंत (गर्मियों और सर्दियों के बीच का मौसम) और गर्मी शुष्क होती है।

विशेषताएँ

  • वातावरण में अपर्याप्त नमी के कारण वसंत और गर्मियों प्रारंभ में वृक्ष अपने पत्ते गिरा देते हैं।
    • ग्रीष्मकाल (अप्रैल-मई) में लगभग अनावृत हो जाते हैं।
  • उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन, अनियमित ऊंचाई (25 से 60 मीटर), भारी तनें  वाले वृक्षों , और अविकसित अधिपादप के साथ मौजूद होते   हैं।
  • ये वन सदाबहार वनों की तुलना में बहुत बड़े क्षेत्र को आच्छादित करते हैं लेकिन इन वनों के अंतर्गत आने वाले प्रमुख क्षेत्र को कृषि के लिए कांट दिया गया है।

लकड़ी

  • इन वनों में पाई जाने वाले वृक्षों की मुख्य प्रजातियाँ सागौन (मूल्यवान इमारती लकड़ी), साल, लॉरेल, शीशम, आंवला, जामुन, बांस, आदि हैं।
  • कम सघन होने के कारण, इन वनों का दोहन करना तुलनात्मक रूप से आसान है।

तटीय  और दलदली वनस्पति (मैंग्रोव वनस्पति / ज्वारीय वन)

  • मैंग्रोव वनस्पति गंगा, महानदी, गोदावरी और कृष्णा नदियों के ज्वारीय डेल्टओं में पाई जाती है।
  • इन क्षेत्रों में 200 सेमी से अधिक की वर्षा होती है।
  • महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजातियां सुंदरी, आगर, भेंडी, कीरा, निपा हैं।
  • इन जंगलों में कछुए, मगरमच्छ, घड़ियाल और सांप भी पाए जाते हैं। रॉयल बंगाल टाइगर इन जंगलों का प्रसिद्ध जानवर है।

मुख्य  विशेषताएं:

  • पेड़ मुख्य रूप से सदाबहार होते हैं।
  • प्रायः  वे कम ज्वार के दौरान दिखाई देने वाली जालीनुमा जड़ों( web of arcing roots) से युक्त होते   हैं।
  • मैनग्रोव  वनस्पति दो स्थितियों के लिए अनुकूलित है-
    • उच्च जल लवणता
    • नियमित अंतराल पर बाढ़
  • इन अनुकूलनों में प्रमुख हैं, अवस्तंभ मूल( prop roots,) और श्वसन मूल(pneumatophores ) आदि की उपस्थिति।
    • अवस्तंभ मूल मैनग्रोव वृक्षों के तने और शाखाओं  की उदवृद्धि का परिणाम है । जैसे ही अवस्तंभ जड़ें जमीन पर पहुंचती हैं,  इन  जड़ों   का अग्रभाग एक भूमिगत जड़  तंत्र का विकास करती है,   जो अवस्तम्भ  जड़  को भूमि से जोड़ती है और फिर आगे इसी प्रकार की जड़ों का विकास  करती है।
  • सहारा देने वाली जड़ें– पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा लगभग उतनी ही तीव्र होती है जितनी कि प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा। अत्यधिक वर्षा मिट्टी में पोषक तत्वों का शीघ्र ही विलय कर देती  है, जिससे यह ऊपरी परतों को छोड़कर अपेक्षाकृत अनुपजाऊ हो जाती है। इस कारण से, वर्षावन वृक्षों की जड़ें एक व्यापक क्षेत्र को आच्छादित करने के लिए नीचे की ओर  बढ़ने के स्थान पर  बाहर की ओर अग्रसरित होती हैं । इससे वर्षावन के वृक्ष  कुछ हद तक अस्थिर हो जाते हैं, क्योंकि उनके नजदीक की भूमि उन्हें अधिक सहारा नहीं दे पाती। कुछ वृक्ष प्राकृतिक तनो को बढ़ाकर इसकी भरपाई करते हैं। ये आश्रय देने वाली जड़ें  मूल रूप से वृक्ष  के तने होते हैं जो वृक्ष से निकलकर भूमि के नीचे तक फैल जाती हैं , जिससे वृक्ष को अतिरिक्त सहारा मिलता है।
  • अवस्तम्भ जड़ें  एक भूमिगत जड़ प्रणाली से उपजी वायुयुक्त जड़ें हैं, जो पौधों को जलमग्न क्षेत्रों में भी वायु ग्रहण  करने में सक्षम बनाती हैं। इनमें छिद्र होते हैं जो वृक्षों  को स्वसन करने में सहायता प्रदान करती हैं जब अन्य जड़ें उच्च ज्वार के दौरान जल  में डूब जाती हैं।
  • मैंग्रोव झाड़ियाँ ” हरित कवच” के रूप में कार्य करती हैं जो समुद्री कटाव., चक्रवातों और सुनामी के संभावित विनाशकारी प्रभावों के विरुद्ध समुद्र तट को सुरक्षित करती हैं।

विशेषताएं

  • पेड़ मुख्य रूप से सदाबहार होते हैं।
  • आम तौर पर निम्न ज्वार(tides) के दौरान मिट्टी से बाहर निकल आने वाली जड़ों के लिए जाले नुमा संरचना विकसित करते हैं।
  • इस वनस्पति के लिए दो स्थितियां अनुकूल हैं:
  • उच्च जल लवणता(High water salinity)
    • नियमित अंतराल पर बाढ़(Flooded at regular intervals)
  • इन अनुकूल स्थितियों में प्रमुख वनस्पति हैं – अवस्तंभ मूल, बट्रेस(उठंगाना), न्यूमेटोफोरस आदि की उपस्थिति।
    • अवस्तंभ मूल (जिसे प्रोप रूट भी कहा जाता है) शाखाओं या मैन्ग्रोव वृक्ष में पहले से मौजूद जड़ों से विकसित होती है। जैसे ही ये जड़ें जमीन तक पहुंचती हैं, इन जड़ों की नोक एक भूमिगत जड़ विकसित करती है जो जमीन के अंदर आगे बढ़ती है।
  • बट्रेस रूट्स – इन जड़ों में पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा, उतनी ही अधिक होती है जितनी प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा होती है। अत्यधिक वर्षा , मिट्टी के पोषक तत्वों को कम कर देती है, जिससे यह शीर्ष परतों को छोड़कर अपेक्षाकृत शुष्क हो जाती है । इस कारण से, वर्षावनो के पेड़ की जड़ें एक व्यापक क्षेत्र में विस्तारित होने  के लिए निचले स्तर तक बढ़ती हैं,  । यह वर्षावन के पेड़ों को कुछ अस्थिर बनाता है, क्योंकि उनके पास जमीन में बहुत मजबूत पकड़ नहीं होती है।
  • श्वसनसूल(Pneumatophores) यह भूमिगत जड़ प्रणाली से उपजी विशेष जड़ें हैं, जो पौधों को जलभराव मिट्टी के आवासों में हवा का उपयोग करने में सक्षम बनाते हैं। इनमें छिद्र होते हैं जो पेड़ों को  श्वसन करने में सक्षम बनाते हैं जब अन्य जड़ें उच्च ज्वार (tides) के दौरान पानी के नीचे डूब जाती हैं ।
  • मैंग्रोव झाड़ियाँ “हरी ढाल” के रूप में काम करती हैं जो चक्रवातों और सुनामी के संभावित विनाशकारी प्रभावों से समुद्र तट के कटाव को रोकती हैं।

वितरण

  • तमिलनाडु के तटों के साथ।
  • ये वन अपेक्षाकृत उच्च तापमान और केवल ग्रीष्मकाल के दौरान वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं ।

जलवायु की स्थिति

  • लगभग 100 सेमी की वार्षिक वर्षा
    • ज्यादातर अक्टूबर-दिसंबर में उत्तर-पूर्व मानसूनी हवाओं से।
  • औसत वार्षिक तापमान लगभग 28 ° C है।
  • औसत आर्द्रता लगभग 75% है।

विशेषताएँ

  • 12 मीटर के ऊंचे तथा छोटे कद के शंकुदार पेड़।
  • 10 से 15 मीटर ऊंचाई के मिश्रित छोटे सदाबहार और पर्णपाती पेड़ों का सघन वितरण।
  • बांस और घास विशिष्ट रूप से अनुपस्थित नहीं हैं।
  • इसमें महत्वपूर्ण प्रजातियां नीम, जामुन, इमली आदि हैं।
  • इन वनों के अंतर्गत आने वाली अधिकांश भूमि कृषि या कैसुरीना वृक्षारोपण (casuarina plantations) के लिए साफ कर दी गई है।

 विस्तृत

वे राजस्थान, पश्चिमी घाट और पश्चिम बंगाल को छोड़कर हिमालय की तलहटी से कन्याकुमारी तक चलने वाली एक अनियमित चौड़ी पट्टी(wide strip) में पाए जाते हैं।

जलवायु की स्थिति

  • वार्षिक वर्षा 100-150 सेमी होती है।
  • ये जंगल 25-32 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं और यहां लगभग छह महीने के शुष्क मौसम के साथ-साथ 75-125 सेमी की वार्षिक वर्षा होती है ।

 विशेषताएं

  • ये वन शुष्क मौसम में नम पर्णपाती जंगलों की तरह अपनी पत्तियां गिराते हैं।
    • बड़ा अंतर यह है कि वे अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बढ़ (grow)सकते हैं ।
  • वे नमी युक्त क्षेत्र पर नम पर्णपाती वाले और सूखे  किनारो पर कांटेदार वन होते हैं।
  • वनों की प्रमुख विशेषता छोटे (10-15 मीटर ऊंचे) पेड़ों की खुली छत्रछाया और झाड़ियों की बहुतायत है।
  • इन वनों में 20 मीटर की ऊंचाई तक उगने वाले कुछ पर्णपाती पेड़ों की प्रजातियाँ भी मिलती है।
  • प्रकाश किरणों, का‌ जमीन पर पर्याप्त ढंग से पहुंचना
  • महत्वपूर्ण प्रजातियाँ टीक, साल, लॉरेल, पलास, खैर, तेंदू, अमलतास, बेल, एक्सलवुड आदि हैं।
  • कृषि कार्यों के लिए इस जंगल के बड़े मार्गों को साफ कर दिया गया है।
  • इन जंगलों को अतिवृष्टि,(overgrazing) आग आदि का सामना करना पड़ा है।

 विस्तृत

  • ये वन पश्चिमी राजस्थान, मध्य प्रदेश, दक्षिण-पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी हरियाणा, कच्छ और सौराष्ट्र के पड़ोसी हिस्सों में विस्तृत हैं।
    • यहां वे थार रेगिस्तान में अपकृष्ट हो जाते हैं ।
  • इस तरह के जंगल कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बड़े क्षेत्रों तथा पश्चिमी घाट के किनारे पर भी पाए जाते हैं।

जलवायु की स्थिति

  • ये जंगल 27-30 डिग्री सेल्सियस के उच्च तापमान और लंबी अवधि के सूखा(आर्द्रता 50% से कम है) के साथ 20-60 सेमी की बहुत कम वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

 विशेषताएं

  • छोटे (8-10 ऊंचे) बिखरी हुई कांटेदार झाड़ियां होती हैं जो पेड़ों की तुलना में अधिक सामान्य रूप से पायी जाती हैं।
  • इन जंगलों में पौधे केवल संक्षिप्त बरसात के मौसम में पत्तियों का विकास करते हैं जब घास और जड़ी बूटी भी प्रचुर मात्रा में हो जाती हैं ,जो वर्ष के अधिकांश दिनों तक पत्तेदार रहती हैं ।
  • बबूल और यूफोरबिया (Acacias and Euphorbias)बहुत प्रमुख हैं।
  • सामान्य रूप से यहां जंगली खजूर पाया जाता है तथा बरसात के मौसम में कुछ घास के पौधे भी उगते है।

मोंटाने उपउष्णकटिबंधीय(Montane Sub-Tropical)

(उप उष्णकटिबंधीय ब्रॉडलीव हिल वन)

SUB-TROPICAL BROAD-LEAVED HILL FORESTS

 

जलवायु की स्थिति

  • औसत वार्षिक वर्षा 75 सेमी से 125 सेमी के बीच होती है।
  • औसत वार्षिक तापमान 18 ° -21 ° C के बीच है।
  • आर्द्रता 80% होती है।

 विस्तृत

  • ये जंगल पर्वत श्रृंखलाओं पर अपेक्षाकृत नम क्षेत्रों में कम ऊंचाई (1000 से 2000 मीटर तक) पर होते हैं।
  • वे मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और असम के पूर्वी हिमालय, खासी की पहाड़ियों, महामंडलेश्वर और नीलगिरी में पाए जाते हैं।

 विशेषताएं

  • जंगलों की मुख्य विशेषता क्लेमर्स और एपिफाइटिक फर्न और ऑर्किड की घनी वृद्धि है।
    • एपिफाइट्स वे पौधे हैं जो पेड़ या अन्य पौधे पर गैर-परजीवी रूप से बढ़ते हैं।
  • सामान्य रूप से पाई जाने वाली प्रजातियाँ सदाबहार ओक, चेस्टनट, एश, बीच, साल और पाइंस(evergreen oaks, chestnuts, ash, beech, sals and pines.) हैं।
  • उत्तर के जंगलों में प्रमुख पेड़ क्वेरकस, शिमा और कास्टानोप्सिस कुछ समशीतोष्ण प्रजातियों के साथ पाए जाते हैं।

उपोष्णकटिबंधीय चीड़ के जंगल(SUBTROPICAL MOIST PINE FORESTS)

विस्तृत

  • ये जंगल हिमालय में 1500-2000 मीटर की सीमा के बीच मध्यम ऊंचाई पर होते हैं ।
  • वे पश्चिमी हिमालय में कश्मीर से उत्तर प्रदेश तक विस्तृत हैं।
  • पूर्वी हिमालय में, ये वन अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागा हिल्स और खासी हिल्स के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

इमारती लकड़ी/काष्ठ(Timber)

  • चिर या चिल सबसे प्रमुख वृक्ष है जो विशुद्ध रूप से सीधे  खड़े  पाए जाते हैं।
  • यह बक्से, फर्नीचर और इमारतों के निर्माण के लिए लकड़ी प्रदान करता है और राल(resin) और तारपीन (turpentine)उत्पादन में भी उपयोग किया जाता है।

 

उप उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वन(SUB-TROPICAL DRY EVERGREEN FORESTS)

 विस्तृत

  • ये जंगल काफी कम तापमान और वर्षा वाले क्षेत्रों में होते हैं।
  • ये वन समुद्र तल से करीब 1000 मीटर ऊपर पूर्वी और पश्चिमी हिमालय, भाबर और शिवालियों क्षेत्रों की निचली ऊंचाई में विस्तृत है।

जलवायु की स्थिति

  • सालाना बारिश 50-100 सेमी (दिसंबर-मार्च में 15 से 25 सेमी) के बीच होती है।
  • यहां गर्मियों में मौसम पर्याप्त रूप से गर्म होता हैं और सर्दियो मे बहुत ठंड पडती हैं।

 विशेषताएं

  • छोटे सदाबहार अवरुद्ध पेड़ और झाड़ियों के साथ निम्न स्क्रब वन।
  • जैतून, बबूल मोदस्टा(लाजवंत) और पिस्ता सबसे प्रमुख प्रजातियां हैं।
  • जंगलों की मुख्य विशेषता कांटेदार ज़ीरोफाइट्स और छोटे सदाबहार पौधों की उपस्थिति है।

मोंटाने टेम्पर्ड(Montane Temperate)

हिमालयन ड्राई टेम्परेचर{( शुष्क आद्रता वाले) वन HIMALAYAN DRY TEMPERATE FORESTS}

 

जलवायु की स्थिति

  • ये जंगल हिमालय के बहुत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मौजूद हैं।
  • वर्षा 100 सेमी से कम होती है और अधिकतर बर्फ के रूप में होती है।

 विशेषताएं

  • ज़ीरोफाइटिक झाड़ियों के साथ शंकुधारी वन।
  • महत्वपूर्ण प्रजातियां चिलगोज़ा, देवदार, ओक, एश, जैतून आदि हैं।

 विस्तृत

  • ऐसे जंगल हिमालय की भीतरी शुष्क पर्वतमाला में पाए जाते हैं जहां दक्षिण-पश्चिम मानसून लद्दाख, लाहुल, चंबा, किन्नौर, गढ़वाल और सिक्किम की तरह काफी कमजोर होता है।

हिमालय नम शीतोष्ण वन (HIMALAYAN MOIST TEMPERATE FORESTS)

 

जलवायु की स्थिति

  • इन क्षेत्रों में 100 सेमी से ऊपर वार्षिक वर्षा होती है लेकिन नमी वाले शीतोष्ण वनों के क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होती है ।

 विस्तृत

  • ये जंगल पूर्वी और पश्चिमी हिमालय में 1700-3500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं।
  • यह कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दार्जिलिंग और सिक्किम पर्वत श्रृंखला में पाए जाते है।

 विशेषताएं

  • मुख्य रूप से शंकुधारी प्रजातियों के वृक्ष पाए जाते हैं।
  • ज्यादातर प्रजातियां शुद्ध किस्म की होती हैं।
  • यहां पेड़ 30 से 50 मीटर ऊंचे होते हैं।
  • देवदार, पॉइंस, सिल्वर फिर्स, स्प्रूस, आदि सबसे महत्वपूर्ण पेड़ हैं।
  • वे ऊँचे लेकिन खुले जंगल होते हैं, जिनमें झाड़ियाँ होती हैं जैसे रोडोडेंड्रोन, ओक और बांस की कुछ प्रजातियां।

इमारती लकड़ी /काष्ट(Timber)

  • इस क्षेत्र की लकड़ी का उपयोग निर्माण कार्यों, तथा रेलवे स्लीपरों के निर्माण में किया जाता है।

मोंटेन नम शीतोष्ण वन (MONTANE WET TEMPERATE FORESTS)

जलवायु की स्थिति

  • औसत वार्षिक वर्षा लगभग 150 सेमी से 300 सेमी के बीच होती है।
  • औसत वार्षिक तापमान लगभग 11 ° C से 14 ° C के बीच होता है।
  • औसत सापेक्ष आर्द्रता 80% से अधिक है।

विस्तृत

  • ये वन ठंडे और उमस भरे पहाड़ों में 1800-3000 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद हैं।
  • में विस्तृत
    • पूर्वी नेपाल से असम तक (पूर्वी हिमालय)।
    • (पश्चिमी हिमालय) कश्मीर से पश्चिमी नेपाल तक।
    • तमिलनाडु और केरल की ऊंची पहाड़ियां में।

 विशेषताएं

  • चूंकि यहां वर्षा अधिक होती है,साथ ही गर्मियों में तापमान मध्यम होता है और सर्दियों में मौसम पर्याप्त ठंडा होता है, इसलिए वाष्पीकरण की दर अधिक नहीं होती है । इसलिए पेड़ वर्ष में अपनी पत्तियों को नहीं गिराते हैं, कम से कम एक ही समय में तो बिल्कुल नहीं।
  • ये बड़ी परिधिय तनो वाले सदाबहार वन हैं।
  • शाखाओं में मूसा, फर्न और अन्य अधिपादप(एपिफाइट्स )पाए जाते हैं।
  • यहां के वृक्ष शायद ही कभी 6 मीटर से अधिक की ऊंचाई तक पहुंचते हैं।
  • दक्षिण भारत में, इन वनों को शोला वन कहा जाता है और ज्यादातर 15-20 मीटर ऊंचे-चौड़े पेड़ होते हैं, जिनमें घने पत्तों की छतरियां, प्रचुर मात्रा में उपजाऊ वनस्पतियाँ और समृद्ध शाकनाशी वृक्ष होते हैं।
  • ओक, पोपलर, एल्म, लॉरेल, मेपल, बिर्च(भुर्ज), एल्डर, मैगनोलिया(सागरिका चम्पक) , आदि महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं।

अल्पाइन वनस्पति

  • ये पूर्वी हिमालय में 2700 मीटर ऊंचाई से ऊपर और पश्चिमी हिमालय में 3000 मीटर से ऊपर पाए जाते हैं।
  • यह बर्च, रोडोडेंड्रॉन(चिमूल), जुनिपर, पाइन और सिल्वर फर का एक घना वन है

विशेषताएं

  • इन वनों को इसमें विभाजित किया जा सकता है:
    • उप-अल्पाइन(sub-alpine)
    • नम अल्पाइन स्क्रब(moist alpine scrub)
    • शुष्क अल्पाइन स्क्रब(dry alpine scrub)
  • अल्पाइन जंगल हिम रेखा तक ऊपर की ओर विस्तार करते हैं और झाड़ियों और स्क्रब के माध्यम से अल्पाइन घास के मैदानों को रास्ता देते हैं।
  • इन क्षेत्रों में गर्मियों के मौसम के दौरान छोटे बौना कॉनिफ़र और हरे-भरे पौष्टिक घास की विशेषता होती है।

बुग्याल्स(Bugyals)

बुग्याल उच्च ऊंचाई वाले अल्पाइन घास के मैदान हैं, जो उत्तरांचल में  सपाट या ढलान वाली स्थलाकृति (3400 मीटर और 4000 मीटर के बीच ऊंचाई पर) हैं और उन्हें ‘प्रकृति के अपने उद्यान’ के रूप में जाना जाता है। इन बुग्यालों की सतह प्राकृतिक हरी घास और मौसमी फूलों से ढकी हुई है। इनका उपयोग आदिवासी चरवाहों द्वारा अपने मवेशियों को चराने के लिए किया जाता है । सर्दियों के मौसम के दौरान अल्पाइन घास के मैदान बर्फ से ढके रहते हैं । गर्मियों के महीनों के दौरान, बुग्यालों सुंदर फूलों और घास से सुसज्जित रहते हैं। बुग्यालों में एक बहुत ही नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र है। बुग्यालों के कुछ उदाहरण

  • औली (जोशीमठ के पास) – यहां एक प्रमुख स्कीई रेंज स्थित है।
  • गोरसो(Gorso)
  • क्वानी बुग्याल(Kwani Bugyal)
  • बेदनी(Bedni)
  • पनवाली और कुश कल्याण(Panwali and Kush Kalyan)
  • दयारा(Dayara)
  • मुनस्यारी बुग्याल(Munsiyari Bugya)

 

                                     भारत में प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

 

उष्णकटिबंधीय सदाबहार(Tropical Evergreen)

नम सदाबहार(Wet Evergreen)

शुष्क सदाबहार(Dry Evergreen)

अर्ध सदाबहार(Semi Evergreen)

उष्णकटिबंधीय पर्णपाती(Tropical Decidous)

नम पर्णपाती(Moist Decidous)

शुष्क पर्णपाती (Dry Decidous)

उष्णकटिबंधीय कटीय (Tropical Throny)

उप-उष्णकटिबंधीय (Sub-Tropical)

ब्रॉड-लीव्ड हिल फॉरेस्ट(Broad-leaved Hill Forest)