मूल अधिकार (उड़ान)

मूल अधिकार (उड़ान)

  • भारतीय संविधान के भागIII में अनुच्छेद 12-35तक मूल अधिकारों का प्रावधान है।
  • मूल अधिकार,अमेरिकी संविधान (अधिकार का बिल–Bill of Rights) से प्रेरित हैं + व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए मूल तत्व:भौतिक,बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक + भारत का मैग्ना कार्टा + न्यायोचित + हर व्यक्ति के लिए मूल अधिकारों की गारंटी लेकिन युक्तियुक्त प्रतिबंध के साथ + राजनीतिक लोकतंत्र के आदर्श + कार्यपालिका की निरंकुशता और विधायिका के कानूनों की मनमानी पर सीमाएं + मूल अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संतुलन संविधान की आधारभूत ढांचा का का हिस्सा है।

 

मूल रूप से सात मूल अधिकार:
  1. समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
  5. सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद29-30)
  6. संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31)àअब अनुच्छेद 300A- 44वां संशोधन अधिनियम, 1978 (कानूनी अधिकार)
  7. सांविधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

44वें संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटाने के बाद वर्तमान में छ: मूल अधिकार हैं।

 

मूल अधिकारों की विशेषताएं
  • कुछ केवल भारतीय नागरिक के लिए उपलब्ध हैं- अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 16, अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30
  • असीमित नहीं हैं लेकिन वाद-योग्य होते हैं, उचित प्रतिबंधों के अधीन।
  • राज्य की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ उपलब्ध हैं।
  • कुछ नकारात्मक विशेषता रखते हैं तो कुछ सकारात्मक।
  • मूल अधिकार स्थायी नहीं हैं, इन्हें संसद द्वारा संशोधित किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 358à अनुच्छेद 19 को केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर लगाए गए आपातकाल के दौरान निलंबित किया जा सकता है। इसे सशस्त्र विद्रोह के कारण लगाए गए आपातकाल के आधार पर निलंबित नहीं किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 359à अनुच्छेद 19 के अलावा, संविधान के भाग 3 में वर्णित किन अधिकारों का कितने समय व किस क्षेत्र में निलंबन होगा, इसके लिए राष्ट्रपति आदेश जारी करेगा। हालाँकि अनुच्छेद 20 और 21 को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान निलंबित नहीं किया जा सकता है।
  • मूल अधिकारों के क्रियान्वयन की सीमाएँà अनुच्छेद 31A (संपत्ति आदि के अधिग्रहण के लिए प्रदान करने वाले कानूनों की रक्षा), अनुच्छेद 31B (9वीं अनुसूची में शामिल होने वाले कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यीकरण) और अनुच्छेद 31C (कुछ नीति-निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाले कानूनों की रक्षा) + सेना विधि (मार्शल लॉ) लागू होने पर मूल अधिकारों का निर्बंधन (अनुच्छेद 34)
  • ज़्यादातर मूल अधिकार स्वयं प्रवर्तित हैं। वहीं कुछ मूल अधिकारों को विधि या कानून के द्वारा प्रभावी बनाया जाता है। इस तरह के कानून भारत की एकता हेतु संसद द्वारा बनाये जाते हैं, न कि राज्यों के विधानमंडल द्वारा। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पूरे देश में एकता बनी रहे।

 

मूल अधिकार

 

 

समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

 

•         विधि के समक्ष समानता एवं विधियो का समान संरक्षण – (अनुच्छेद 14)

•         धर्म, मूलवंश,जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध- (अनुच्छेद 15)

•         लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता – (अनुच्छेद 16)

•         अस्पृश्यता का अंत- (अनुच्छेद 17)

•         उपाधियों का अंत – (अनुच्छेद 18)

 

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)

•         स्वतंत्रता के संबंधित छह अधिकारों का संरक्षण: (i) वाक और अभिव्यक्ति (ii) सम्मेलन (iii) संघ (iv) संचरण (v) निवास और (vi) पेशा (वृत्ति)- अनुच्छेद 19

•         अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण- अनुच्छेद 20

•         प्राण और दैहिक स्‍वतंत्रता का संरक्षण- अनुच्छेद 21

•         प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार – अनुच्छेद 21A

•         कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण – अनुच्छेद 22

शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)

 

  •          मानव और दुर्व्‍यापार और बलात्श्रम का प्रतिषेध- अनुच्छेद 23
  •          कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध- अनुच्छेद 24
 

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

  •          अंत:करण की और धर्म की अबाध रूप से माननेआचरण और प्रचार करने की स्‍वतंत्रता – अनुच्छेद 25
  •          धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता – अनुच्छेद 26
  •         किसी विशिष्‍ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्‍वतंत्रता- अनुच्छेद 27
  •          कुल शिक्षा संस्‍थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्‍वतंत्रता – अनुच्छेद 28
सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

 

  •         भाषा, लिपि और अल्प-संख्यकों वर्गों की संस्कृति का संरक्षण – अनुच्छेद 29
  •          शैक्षिक संस्थान की स्थापना और प्रशासन के लिए अल्प-संख्यकों वर्गों का अधिकार- अनुच्छेद 30
सांविधानिक उपचारें का अधिकार (अनुच्छेद 32) •         मूल अधिकारों के प्रवर्तन कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार (संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत) – अनुच्छेद 32

 

                   

       मूल अधिकार और सांविधानिक प्रावधान

 

अनुच्छेद व्याख्या
 

 

अनुच्छेद 12

•         अनुच्छेद 12 में “राज्य” शब्द को परिभाषित किया है जिसमें सरकार और संसद + सरकार और राज्यों की विधायिका + सभी स्थानीय प्राधिकरण अर्थात नगरपालिकाएं, पंचायत, जिला बोर्ड, सुधार संस्था आदि+ अन्य सभी प्राधिकरण, अर्थात् वैधानिक या गैर-वैधानिक प्राधिकरण जैसे एलआईसी (LIC), ओएनजीसी (ONGC), सेल (SAIL) आदि।

•         उच्चतम न्यायालय के अनुसार : एक निजी निकाय या राज्य के एक उपकरण के रूप में काम करने वाली संस्था भी अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा के अंतर्गत आती है।

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 13

•         अनुच्छेद 13 – सभी “विधि” जो किसी भी मूल अधिकार के साथ असंगत या अपमानजनक हैं, शून्य हो जाएंगे।

•         शब्द “विधि” निरूपित करता है: संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गई स्थायी विधियाँ + राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपालों द्वारा जारी किए गए अध्यादेश जैसी अस्थायी विधियाँ + प्रत्यायोजित विधान की प्रकृति में सांविधानिक साधन जैसे – आदेश, नियम,उपविधि,विनियमन या अधिसूचना + विधि के गैर विधायी स्रोत जैसे रूढ़ि या प्रथा जो विधि का प्रभाव रखती हो।

•         इन्हें मूल अधिकारों के उल्लंघन के रूप में अदालतों में चुनौती दी जा सकती है और इसलिए इसे शून्य घोषित किया जा सकता है।

•         अनुच्छेद 13 न्यायिक पुनरावलोकन प्रदान करता है।

•         अनुच्छेद 13 घोषित करता है कि संविधान संशोधन कोई विधि नहीं है इसलिए इसे चुनौती नहीं दी जा सकती है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में कहा कि मूल अधिकारों के हनन के आधार पर चुनौती दी जा सकती है। यदि वह संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ हो तो उसे अवैध घोषित किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 14

•         विधि के समक्ष समानता का अधिकार (ब्रिटिश धारणा + नकारात्मक धारणा) + विधियों का समान संरक्षण (अमेरिकी अवधारणा + सकारात्मक धारणा)।

•         अनुच्छेद 14: राज्य किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता या राज्य क्षेत्र में विधियों के समान संरक्षण से इनकार नहीं करेगा।

•         विधि के समक्ष समानता (ब्रिटिश धारणा): किसी भी व्यक्ति के पक्ष में किसी विशेष विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति + साधारण विधि या साधारण विधि न्यायलय के तहत सभी व्यक्तियों के लिए समान व्यवहार + कोई व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है।

•         विधियों का समान संरक्षण (अमेरिकी अवधारणा):विधियों द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों और अध्यारोपित दायित्वों दोनों में समान परिस्थियों क अंतर्गत व्यवहार समता + समान विधि के अंतर्गत सभी व्यक्तियों के  लिए समान नियम + बिना भेदभाव के सभी के साथ समान व्यवहार।

•         सभी व्यक्तियों को प्रदान किए गए हैं (नागरिकों और विदेशियों) और इसमें विधिक व्यक्ति (सांविधानिक निगम, कंपनियां, पंजीकृत संस्थाएं या किसी अन्य प्रकार के विधिक व्यक्ति) शामिल हैं।

•         विधि का शासन: विधि के समक्ष समानताàविधि का शासन à ए वी डायसी

•         विधि का शासन à संविधान की मूल विशेषता

•         समता के अपवाद:

Ø  भारत के राष्ट्रपति और राज्यपाल + विदेशी संप्रभु और राजनयिक + यूएनओ (UNO) और उसकी अन्य संस्था।

Ø  अनुच्छेद 31C (उच्चतम न्यायालय का कहना है कि जहां अनुच्छेद 31C आता है, वहाँ से अनुच्छेद 14 चला जाता है)

Ø  अनुच्छेद 361A : संसद या राज्य विधायिका की किसी भी कार्यवाही की सत्य कार्यवाही से संबन्धित विषय-वस्तु का समाचार पत्र मैं करता है तो उस पर किसी भी प्रकार का दीवानी या फ़ौजदारी का मुकदमा, देश क किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकेगा।

Ø  अनुच्छेद 105: संसद के सदस्यों को संसदीय विशेषाधिकार।

Ø  अनुच्छेद 194: राज्य की विधायिका या उसकी समिति के सदस्यों को विशेषाधिकार।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 15

•         अनुच्छेद 15: कुछ आधारों पर विभेद का प्रतिषेधàराज्य केवल धर्म, जाति, मूल वंश,लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करेगा।

•         यह प्रावधान राज्य और निजी व्यक्तियों दोनों द्वारा भेदभाव पर रोक लगाता है।

•         अनुच्छेद 15 (3) और 15 (4) देश में आरक्षण का मूलभूत आधार हैं।

•         विभेद से प्रतिषेध के इस सामान्य नियम के चार अपवाद: राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए कोई विशेष प्रावधान करने की अनुमति है। + राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति एवं जनजाति की उन्नति के लिए विशेष उपबंध कर सकता है।  + राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति एवं जनजाति की उन्नति के लिए शैक्षणिक संस्थानों (निजी संस्थान जो राज्य से अनुदान प्राप्त करते हैं या नहीं तथा अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर) में प्रवेश के लिए कोई विशेष नियम बना सकता है + नागरिकों के किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की उन्नति के लिए।

शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण:

अनुच्छेद 15(C)में अपवादà 93वाँ संशोधन अधिनियम = अधिनियमित केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006à IIT और IIM सहित सभी केंद्रीय उच्च शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान।

शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण:

उपर्युक्त अपवाद (C) को 2019 के 103वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था à केंद्र सरकार ने 2019 में

आदेश जारी किया था à आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान।

 

 

अनुच्छेद 16

  •         अनुच्छेद 16: राज्य के तहत किसी भी कार्यालय में रोजगार या नियुक्ति के मामलों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता। केवल धर्म, जाति, सम्प्रदाय, लिंग, वंश, जन्म स्थान या निवास स्थान के आधार पर किसी भी रोजगार या कार्यालय के लिए किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

लोक नियोजन में समता के संबंध में चार अपवाद:

1.  संसद, राज्य या केंद्रशासित प्रदेश या स्थानीय प्राधिकरण या अन्य प्राधिकरण में नियुक्ति के लिए निवास की शर्त का उल्लेख कर सकती है।(अभी केवल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में)।

2.  राज्य किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान कर सकता है जो राज्य सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

3.  विधि के अनुरूप किसी संस्था (धार्मिक या संप्रदाय से संबंधित) या इसके कार्यकारी परिषद के सदस्य की धार्मिक आधार पर व्यवस्था की जा सकती है।

4.  राज्य à किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के नागरिक की नियुक्ति के पक्ष में 10% तक आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति दी गई।

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 17

 

  •        अस्पृश्यता का अंत: किसी भी रूप में अस्पृश्यता की मनाहीà अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 = 1976 में संशोधन किया गया और नया नाम नागरिक अधिकारों किन रक्षा अधिनियम दिया गया।
  •          अस्पृश्यता – संविधान या अधिनियम में परिभाषित नहीं है।
  •         मैसूर उच्च न्यायालय: “अनुच्छेद 17 की विषय वस्तु शाब्दिक या व्याकरणिक अर्थों में अस्पृश्यता नहीं है, लेकिन देश में ऐतिहासिक रूप से विकसित हुई थीà सामाजिक निर्योगयता कुछ वर्गों पर थोप दी गई।
  •         कुछ व्यक्तियों के सामाजिक बहिष्कार या धार्मिक सेवाओं आदि से उनके बहिष्कार को सम्मिलित नहीं किया गया है।
  •          निजी व्यक्ति और राज्य के संवैधानिक दायित्व के खिलाफ उपलब्ध है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है।
 

 

 

अनुच्छेद 18

 

  •         यह राज्य को किसी भी (चाहे वह एक नागरिक या विदेशी हो) किसी भी उपाधि (एक सैन्य या शैक्षणिक सम्मान को छोड़कर) प्रदान करने को निषेध करता है।
  •          यह भारत के नागरिक को किसी भी विदेशी राज्य से किसी भी उपाधि को स्वीकार करने का निषेध करता है।
  •        1996 में, सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय पुरस्कारों- भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री की संवैधानिक वैधता को उचित ठहराया था।
  •         सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ये पुरस्कार उपाधि तथा अनुच्छेद 18 के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं होता है।
  •        सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि पुरस्कार पाने वालों के नाम के प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा, उन्हें पुरस्कार वापस देना होगा।
  •         राज्य के तहत लाभ या विश्वास का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति किसी भी विदेशी राज्य से या उसके अधीन किसी भी रूप में कोई भेंट, उपलब्धि या पद राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता है।

 

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19): अनुच्छेद 19 स्वतंत्रता के संबंधित छह अधिकारों का संरक्षण करता है। यह हैं:
  • मूल रूप से अनुच्छेद19 में 7 अधिकार थे à 44वें संशोधन अधिनियम,1978 के द्वारा संपत्ति के अधिकार को हटा दिया गया था। जो अब अनुच्छेद 300A के अंतर्गत आता है।
  1. वाक और अभिव्यक्ति कीस्वतंत्रता का अधिकार
  2. शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का अधिकार

3.सगम या संघ या सहकारी संस्था बनाने काअधिकार

  1. भारत के राज्यक्षेत्र में सवत्रर् अबाध संचरण का अधिकार
  2. भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भी भाग में निवास करने और बसने का अधिकार
  3. कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने का अधिकार
  • इन छह अधिकारों की रक्षा केवल राज्य के खिलाफ मामले में कर सकते हैं न कि निजी मामले में। केवल नागरिकों को [विदेशी और कानूनी लोगों जैसे कंपनी या परिषदों के लिए]
  • राज्य इन 6 अधिकारों पर अनुच्छेद 19 में वर्णित आधारों पर ही उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
 

 

 

 

 

वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद19 (1):

उच्चतम न्यायालय ने वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निम्नलिखित को शामिल किया है:

1. अपने विचारों के साथ-साथ दूसरों के विचारों को प्रसारित करने का अधिकार

2. प्रेस की स्वतंत्रता

3. व्यावसायिक विज्ञापनों की स्वतंत्रता

4. फोन टेपिंग के विरुद्ध अधिकार

5. प्रसारित करने का अधिकार, यानी सरकार का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कोई एकाधिकार नहीं है।

6. किसी राजनीतिक दल या संगठन द्वारा आयोजित बंद के खिलाफ अधिकार

7. सरकारी गतिविधियों के बारे में जानने का अधिकार

8. शांति का अधिकार

9. अखबार पर पूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ अधिकार

10. प्रदर्शन और विरोध का अधिकार लेकिन हड़ताल करने का अधिकार नहीं

 

उचित प्रतिबंध: भारत की संप्रभुता और अखंडता + राज्य की सुरक्षा + विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध + सार्वजनिक आदेश + शिष्टता + नैतिकता +न्यायालय की अवहेलना + मानहानि + अपराध में संलिप्तता।

 

 

 

 

वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 19 (2):

  •         सभी नागरिकों को बिना हथियारों के शांतिपूर्वक संगठित होने का का अधिकार
  •         सार्वजनिक सभा, प्रदर्शन और जुलूस निकालने का अधिकार
  •          केवल सार्वजनिक भूमि पर + शांतिपूर्ण + बिना हथियारों के
  •         हिंसा,अव्यवस्था, गलत संगठन एवं सार्वजनिक शांति भंग करने का अधिकार नई देता है।
  •          हड़ताल करने का अधिकार नहीं

 

 

उचित प्रतिबंध:

  •         भारत की संप्रभुता और अखंडता + सार्वजनिक आदेश
  •         धारा 144 – आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1973): मजिस्ट्रेट एक सभा, बैठक या जुलूस को रोक सकता है à मानव जीवन के लिए खतरा, स्वास्थ्य या सुरक्षा,सार्वजनिक जीवन में व्यवधान या दंगा भड़काने के आधार पर।
  •         भारतीय दंड संहिता (IPC)की धारा 141: पाँच या अधिक व्यक्तियों का संगठन गैर कानूनी  हो सकता है यदि:

Ø  किसी भी कानून या कानूनी प्रक्रिया के निष्पादन का विरोध करना

Ø  किसी व्यक्ति की संपत्ति पर जबरन कब्जा करना

Ø  किसी आपराधिक कार्य की चर्चा हो

Ø  किसी व्यक्ति को गैरकानूनी काम करने के लिए मजबूर करना

Ø  सरकार या उसके कर्मचारियों को उनकी विधायी शक्तियों के प्रयोग हेतु धमकाना

 

 

 

 

 

संगम या संघ बनाने का अधिकार

अनुच्छेद 19 (3):

  •          अनुच्छेद 19 (3): सभी नागरिकों को संगम,संघ या सहकारी समितियों के गठन का अधिकार है:
  •          गठित करने का अधिकार: राजनीतिक दल + कंपनी + साझेदारी फर्म + समितियां +क्लब + संगठन + ट्रेड यूनियन या लोगों की अन्य इकाई
  •          संगम या संघ को नियमित रूप से संचालित करने का अधिकार
  •          संगम या संघ के गठन या उसमें शामिल होने के नकारात्मक अधिकार भी शामिल हैं।
  • उचित प्रतिबंध:
  •         भारत की संप्रभुता और अखंडता + सार्वजनिक आदेश + नैतिकता
  •          संगम की स्वीकारोक्ति या मान्यता प्राप्त करना मूल अधिकार नहीं है।

ट्रेड यूनियन के लिए उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि:

Ø  मोलभाव या सौदेबाजी का कोई अधिकार नहीं है।

Ø  हड़ताल करने का कोई अधिकार नहीं है।

Ø  हड़ताल के अधिकार को उपर्युक्त औद्योगिक कानून के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

Ø  तालाबंदी करने का कोई अधिकार नहीं है।

 

 

 

अबाध संचरण का अधिकार

अनुच्छेद 19 (4):

  •         प्रत्येक नागरिक को संचरण का अधिकार à एक राज्य से दूसरे राज्य में या एक राज्य के भीतर
  •         भारत की एकता à राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देती है
  • उचित प्रतिबंध: आम जनता का हित + किसी अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण
  •          उच्चतम न्यायालय : सार्वजनिक स्वास्थ्य और नैतिकता के आधार पर वेश्या के संचरण के अधिकार को प्रतिबंधित किया जा सकता है।
  •          आंतरिक स्वतंत्रता – देश में निर्बाध संचरण का अधिकार à अनुच्छेद 19
  •         बाहरी स्वतंत्रता: देश के बाहर घूमने का अधिकारà अनुच्छेद 21
 

निवास करने का अधिकार

अनुच्छेद19 (5):

  •          देश के कई हिस्सों में,जनजातियों को अपनी संस्कृति के संरक्षण हेतु अपने नियम और कानून के बनाने का अधिकार है।
  •         निवास का अधिकार और घूमने का अधिकार एक दूसरे के पूरक हैं।
 

 

व्यापार या कारबार करने का अधिकार

अनुच्छेद19 (6):

  •          सभी नागरिकों को किसी भी पेशे को अपनाने, व्यवसाय करने एवं व्यापार शुरू करने का अधिकार है।
  •         यह अधिकार बहुत विस्तृत हैà यह जीवन निर्वहन हेतु आय से संबन्धित है।
  •          राज्य सशक्त है कि वह:

Ø  किसी पेशे या व्यवसाय के लिए आवश्यक व्यावसायिक / तकनीकी योग्यताओं को जरूरी ठहरा सकता है।

Ø  किसी भी व्यापार, व्यवसाय, उद्योग या सेवा को पूर्ण या आंशिक रूप से स्वयं जारी रख सकता है।

 

  •          राज्य को अपने एकाधिकार को सही ठहराने की आवश्यकता नहीं है।
  •          इस अधिकार में ऐसा पेशा या व्यवसाय या व्यापार शामिल नहीं है जो अनैतिक है या खतरनाक है– राज्य इन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा सकता है या संचालन के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता कर सकता है।
 

 

 

 

 

 

अनुच्छेद20

  •          अनुच्छेद 20-किसी आरोपी व्यक्ति चाहे वो नागरिक हो या विदेशी या कानूनी व्यक्ति (कंपनी या परिषद) के विरुद्ध मनमाने और अत्यधिक सजा से संरक्षण प्रदान करता है।
कोई पूर्वपद प्रभाव कानून नहीं: कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि उसने कार्य करने के समय, जो अपराध के रूप में आरोपित है, किसी प्रव्रत विधि का अतिक्रमण नहीं किया है या उससे अधिक शक्ति का भागी नहीं होगा, जो उस अपराध के लिए जाने के समय प्रव्रत विधि के अधीन अधिरोपित कि जा सकती थी।
दोहरी क्षति नहीं: किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।

नोट: केवल न्यायालय या न्यायिक न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही पर अर्थात् निकायों के लिए जो प्रकृति में न्यायिक हैं।

स्व-अभिशंसन नहीं: किसी भी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा (मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य दोनों के लिए। इसका विस्तार दीवानी सुनवाई पर नहीं हो सकता है या जो सुनवाई आपराधिक प्रकृति की न हों)
 

 

अनुच्छेद21

  •         अनुच्छेद 21: किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।
  •         गोपालन मामले (1950): सर्वोच्च न्यायालय–

Ø  अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण मनमानी कार्यकारी कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के विरुद्ध।

Ø  व्यक्तिगत स्वतंत्रता = केवल व्यक्ति या व्यक्ति के शरीर से संबंधित स्वतंत्रता।

 

मेनका गांधी केस (1978): अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या –

Ø  व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को विधि द्वारा वंचित नहीं किया जा सकता है बशर्ते उस विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया उचित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हो।

Ø  जीवन का अधिकार = मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार

Ø  व्यक्तिगत स्वतंत्रता = व्यापक आयाम और इसमें कई प्रकार के अधिकार शामिल हैं जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गठन करते हैं।

 

 

 

 

अनुच्छेद 21A

  •          अनुच्छेद 21A राज्य छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा – इसका निर्धारण राज्य करेगा।
  •          86वां संशोधन अधिनियम,2002सभी के लिए शिक्षा – “नागरिकों के अधिकार के मामले में दूसरी क्रांति कि तरह उठाया गया कदम था।”
  •          भाग 4 के अनुच्छेद 45– राज्य के नीति निदेशक तत्व – मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध
  •         अभी का बदलाव – राज्य सभी बच्चों को 14 वर्ष कि आयु पूरी करने तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षादेने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।
  •          अनुच्छेद51Aभारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह छह या चौदह वर्ष तक के अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान कराएगा।
  •         1993 – उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत मुफ्त शिक्षा के अधिकार को मान्यता दी।
 

अनुच्छेद 22

  •          अनुच्छेद 22: किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी एवं निरोध से सुरक्षा प्रदान करता है।
  •          निवारक हिरासत à बिना सुनवाई के अदालत में दोषी ठहराया जाए।
  •          दंड विषयक हिरासतàअदालत में दोषी ठहराया जाने के बाद दंड देना।
  •          अनुच्छेद 22(1)अनुच्छेद 22 के इस पहले भाग में साधारण कानून के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकार का वर्णन है :
  •          गिरफ्तार करने  के आधार पर सूचना देने का अधिकार + विधि व्यवसायी से परामर्श और प्रतिरक्षा करने का अधिकार + मजिस्ट्रेट के समक्ष 24 घंटे में, यात्रा के समय को मिलाकर पेश किए जाने का अधिकार  + मजिस्ट्रेट द्वारा बिना अतिरिक्त निरोध दिये 24 घंटे में रिहा करने का अधिकार।
  •          यह सुरक्षा विदेशी व्यक्ति या निवारक हिरासत कानून के अंतर्गत गिरफ्तार व्यक्ति के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
  •         अनुच्छेद 22(2) – अनुच्छेद 22 के इस दूसरे दंड विषयक कानून के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकार का वर्णन है।
  •         यह सुरक्षा दोनों नागरिक के साथ-साथ विदेशी व्यक्ति के लिए भी उपलब्ध है।
  •          जब तक सलाहकार बोर्ड विस्तृत या उचित कारण न बताए तब तक किसी व्यक्ति की हिरासत तीन महीने से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती। बोर्ड में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश होंगे।
  •          अनुच्छेद 22, संसद को भी यह निर्धारित करने के लिए अधिकृत करता है: परिस्थितियों और मामलों के वर्ग जिनमें एक व्यक्ति को एक निवारक निरोध कानून के तहत तीन महीने से अधिक समय तक हिरासत में रखा जा सकता है, बिना सलाहकार समिति की राय प्राप्त किए + अधिकतम अवधि जिसके लिए किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है। एक निवारक निरोध कानून + प्रक्रिया के तहत मामलों की कक्षाएं एक जांच में एक सलाहकार बोर्ड द्वारा पालन की जानी चाहिए।
  •          अनुच्छेद 22 संसद को यह निर्धारित करने की शक्ति भी देता है कि: किन परिस्थितियों के अधीन और किस वर्ग के मामलों में किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन, सलाहकार बोर्ड की राय के बिना ही तीन माह से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध किया जा सकता है + निवारक निरोध कानून के अंतर्गत किसी व्यक्ति को अधिकतम कितने समय के लिए निरोध में रखा जा सकता है + जांच के दौरान सलाहकार बोर्ड द्वारा अपनाई जाने वाली रीति।
  •         रक्षा, विदेशी मामले और भारत की सुरक्षा जुड़े मामलों के लिए निवारक कानून के निर्माण के लिए संसद के पास अनन्य अधिकार है।
 

 

 

 

अनुच्छेद 23

  •          अनुच्छेद 23: मानव व्यापार एवं बलात श्रम का निषेध।
  •          यह अधिकार निगरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को प्राप्त होते हैं।
  •          यह अधिकार किसी व्यक्ति को राज्य और किसी अन्य व्यक्ति दोनों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  •          अनुच्छेद 23 राज्य को यह अधिकार देता है कि राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा, जैसे सैन्य सेवा या सामाजिक सेवा, आरोपित कर सकता है, जिसके लिए वह वेतन देने के लिए बाध्य नहीं है।
  •         नोट: अनुच्छेद 23 में “आयु” का निर्धारण नहीं किया गया है।
  •          मानव दुर्व्यापार से अभिप्राय है: पुरुषों,महिलाओं और बच्चों की वस्तुओं के समान खरीद एवं बिक्री + वेश्यावृत्ति सहित महिलाओं एवं बच्चों के साथ अनैतिक देह व्यापार + देवदासी प्रथा + दास प्रथा।
 

 

अनुच्छेद 24

  •         अनुच्छेद 24 फैक्ट्री, खानों या अन्य खतरनाक कार्यों जैसे निर्माण कार्य या रेलवे के कार्यों में 14 वर्ष के कम आयु के बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध।
  •          यह नुकसान न पाहुचने वाले और आसान कार्यों में नियोजन को प्रतिबंधित नहीं करता है।
  •          बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, बालकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग और बाल अधिकारों के उल्लंघन या बालकों के साथ होने वाले अपराधों के तीव्र विचारण के लिए बाल न्यायालय की स्थापना का प्रावधान करता है।
 

 

 

अनुच्छेद 25

 

  •          अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार: सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतन्त्रता के  धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार।
  •         प्रचार-प्रसार के अधिकार के अंतर्गत किसी व्यति को अपने धर्म में धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है।
  •          अनुच्छेद 25 में प्रदान करता है- धार्मिक विश्वास + धार्मिक पुजा, परंपरा के आचरण का अधिकार
  •          अपवाद: लोक व्यवस्था + नैतिकता + स्वास्थ्य + मूल अधिकारों से जुड़े अन्य प्रावधान के उल्लंघन + धर्मांतरण आदि के मामले में 25 लागू नहीं होता है।
 

 

अनुच्छेद 26

 

  •         अनुच्छेद 26प्रत्येक धार्मिक सामुदाय या उसके किसी अनुभाग को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होंगे: धार्मिक और मूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार +  चल एवं अचल संपत्ति को अर्जित करने और उसका स्वामित्व रखने का अधिकार + ऐसे संपत्ति को विधि के अनुसार प्रशासित करने का अधिकार+ स्वयं के धर्म विषयक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार।

 

अनुच्छेद 25 अनुच्छेद 26
अन्तःकरण की स्वतन्त्रता और धर्म के अबाध अनुकरण एवं प्रसार का अधिकार धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतन्त्रता
अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों एवं उसके अनुभागों को अधिकार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 25 व्यक्तिवादी धार्मिक स्वतन्त्रता की रक्षा करा है। अनुच्छेद 26 समूहिक रूप से धार्मिक अधिकारों की रक्षा करता है।
अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त अधिकार लोक व्यवस्था,नैतिकता,स्वास्थ्य, मूल अधिकारों से जुड़े अन्य प्रावधान के उल्लंघन और धर्मांतरण के मामले मे लागू नहीं होगा। अनुच्छेद 25 की तरह ही अनुच्छेद 26 भी लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वस्थ्य मूल अधिकारों से जुड़े अन्य प्रावधान के उल्लंघन और धर्मांतरण के मामले मे लागू नहीं होगा।

 

 

 

 

अनुच्छेद 27

 

  •          अनुच्छेद 27धर्म की अभिवृद्धि के लिए के संदाय से स्वतन्त्रता: किसी भी व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि या पोषण में व्यय करने के लिए करों के संदाय के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
  •          इसके माध्यम से राज्य को किसी धर्म के मुक़ाबले दूसरे धर्म का पक्ष लेने से रोकने का प्रावधान किया गया है à करों के रूप में एकत्रित धन का प्रयोग सभी धर्मों के रखरखाव और उन्नति के लिए किया जा सकता है।

केवल कर के एकत्रण पर रोक है, शुल्क पर नहीं।

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 28

 

  •          अनुच्छेद 28धार्मिक शिक्षा में भाग लेने से स्वतंत्रता पूर्णतः राज्य निधि से संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
  •          हालांकि राज्य द्वारा प्रशासित किन्तु किसी विन्यास या न्यास द्वारा स्थापित संस्थाओं के लिए यह व्यवस्था लागू नहीं होती है।
  •         अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थाओं में 4 प्रकार से विभेद करता है:

1.  पूर्णतः राज्य पोषित संस्थाएं- धार्मिक निर्देश पूर्णतः निषेध

2.  राज्य द्वारा प्रशासित किन्तु न्यास द्वारा स्थापित – धार्मिक शिक्षा की अनुमति

3.  राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान

4.  राज्य द्वारा वित्त सहायता प्राप्त करने वाले संस्थान

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 29

 

 

  •         अनुच्छेद 29 भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को अपनी बोली, भाषा, लिपि, संस्कृति को सुरक्षित करने का अधिकार है।
  •          किसी भी नागरिक को राज्य के अंतर्गत आने वाले शैक्षणिक संस्थान या राज्य से सहायता प्राप्त संस्थान में धर्म, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से रोका नहीं जाएगा।।
  •          अनुच्छेद 29 (1)समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा करने वाले प्रावधान
  •          अनुच्छेद 29 (2)नागरिक के व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी के प्रावधान, चाहे वह जिस भी समुदाय का हो।
  •          अनुच्छेद 29 धार्मिक और भाषायी दोनों अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  •          संविधान में “अल्पसंख्यक” को परिभाषित नहीं किया गया है।
  •          सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि:

1.  भाषा के संरक्षण में भाषा के संरक्षण के लिए आंदोलन करने का अधिकार भी शामिल है।

2.  इस अनुच्छेद में दी गई व्यवस्था केवल अल्पसंख्यकों तक ही सीमित नहीं है। क्योंकि “नागरिकों के अनुभाग” का  अभिप्राय अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों से है।

 

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 30

 

  •         अनुच्छेद 30शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक वर्गों (धार्मिक और भाषायी) को निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है:-

Ø  सभी अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि के शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित करने और उनके प्रशासन का अधिकार होगा।

Ø  किसी अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा स्थापित और प्रशासित शिक्षा संस्था की संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के लिए  उपबंध करने वाली विधि बनाते समय, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी संपत्ति के अर्जन के लिए विधि द्वारा नियत या उसके अधीन अवधारित रकम इतनी हो कि उस खंड के अधीन प्रत्याभूत अधिकार निर्बंधित या निराकृत न हो जाए। (44वां संविधान संशोधन)

Ø  सहायता देने में राज्य अल्पसंख्यक द्वारा प्रबंधित किसी भी शैक्षणिक संस्थान के साथ भेदभाव नहीं करेगा।

Ø  अनुच्छेद 30 के तहत सुरक्षा की गारंटी केवल अल्पसंख्यकों (धार्मिक एवं भाषायी) तक ही सीमित है ।

  •          नोट: अनुच्छेद 30 के अल्पसंख्यकों (धार्मिक एवं भाषायी) की सुरक्षा का विस्तार नागरिकों के किसी अन्य अनुभाग के लिए नहीं है (अनुच्छेद 29 की तरह नहीं)।
 

 

अनुच्छेद  32

 

  •          अनुच्छेद 32: नागरिकों के मूल अधिकरों के प्रवर्तन हेतु संवैधानिक उपचार का अधिकार + आधारभूत ढाँचा का हिस्सा हैं।
  •          उच्चतम न्यायालय मूल अधिकारों के रक्षक के रूप में कार्य करता है।
  •          अंबेडकर: एक अनुच्छेद जिसके बिना संविधान अर्थ विहीन है, यह संविधान की आत्मा और हृदय है।
  •          अनुच्छेद 32 के चार प्रावधान: मूल अधिकारों को लागू करवाने हेतु उच्चतम न्यायालय जाया जा सकता है + उच्चतम न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति है + संसद किसी भी अन्य न्यायालय को आदेश , निदेश या रिट की शक्ति सौंप सकती है + संविधान में वर्णित प्रावधान के अतिरिक्त यह अधिकार निलंबित नहीं किया जा सकता।

 

 

सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय
  •         अनुच्छेद 32: प्राथमिक क्षेत्राधिकार, अनन्य नहीं।
  •          वादी उच्च न्यायालय में भी जा सकता है।
  •          केवल मौलिक अधिकारों को ही लागू कार्य जा सकता है।
  •          क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालय से अधिक विस्तृत है।
  •          रिट जारी करने से माना नहीं कर सकता है। इस प्रकार यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक और प्रत्याभूतिकर्ता (Defender and Guarantor) है।
  •          अनुच्छेद 226: अनन्य और प्राथमिक क्षेत्राधिकार।
  •          कानूनी और संवैधानिक अधिकार तथा परंपरागत अधिकार।
  •         विस्तृत रिट अधिकारिता।
  •          संकीर्ण क्षेत्राधिकार (केवल राज्य की सीमा तक)।
  •          रिट जारी करने से माना कर सकता है।

 

रिट – प्रकार और क्षेत्र
  • उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय जारी कर सकते हैं: बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), उत्प्रेषण ( Certiorari) और अधिकार-प्रच्छा (Quo-Warranto)। ये रिट अँग्रेजी कानून से ली गई हैंà इन्हें विशेषाधिकार रिट कहा जाता है = इन्हें न्याय का झरना भी कहा जाता है।
 

 

बंदी प्रत्यक्षीकरण

o    अर्थ: “को प्रस्तुत किया जा” + न्यायलय गिरफ्तारी का आदेश जारी करने वाले अधिकारी को आदेश जारी करता है कि वह बंदी को न्यायाधीश के सामने उपस्थिति दर्ज करें। 

  •          गैरकानूनी बंदी या हिरासत में लिए जाने के खिलाफ़ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक हथियार + जबरन हिरासत में रखने के विरुद्ध +  सार्वजनिक प्राधिकरण या व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ जारी की सकती है।
  •          तब जारी नहीं की जा सकती, जब, हिरासत कानून सम्मत हो + न्यायालय की अवमानना + न्यायालय के द्वारा हिरासत + हिरासत न्यायालय के न्यायक्षेत्र से बाहर हुई हो।
परमादेश

 

 

 

  •          अर्थ: “हम आदेश देते हैं”
  •         गतिविधि को निर्देशित करता है + न्यायलय द्वारा सार्वजनिक अधिकारी को जारी किया जाता है कि वह उस कार्य को करें जो उसके क्षेत्र अधिकार के अंतर्गत है।
  •          किसी भी सार्वजनिक निकाय, निगम, अधीनस्थ न्यायालयों, प्राधिकरण या सरकार के खिलाफ समान उद्देश्य के लिए जारी किया जा सकता है।
  •         जारी नहीं की जा सकती: निजी व्यक्ति या निकाय के खिलाफ + गैर-संवैधानिक विभागों + जब कर्तव्य विवेकाधीन हो,+ संविदात्मक दायित्व को लागू करने के विरुद्ध + राष्ट्रपति या राज्यपाल के खिलाफ + उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जो न्यायिक क्षमता में कार्यरत हैं।
 

 

प्रतिषेध

  •          अर्थ: “रोकना”
  •          उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों + न्यायक्षेत्र से उच्च न्यायिक कार्यों को रोकने के लिए + केवल न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारों के खिलाफ ही जारी की जा सकती है।
  •          उपलब्ध नहीं है: प्रशासनिक प्राधिकरण + विधायी निकायों + निजी व्यक्ति और निकायों के लिए।
 

 

 

उत्प्रेषण

  •          अर्थ: “प्रमाणित होना या सूचना देना है”
  •          उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों कों या अधिकरणों को या लंबित मामलों के स्थानांतरण को सीधे या पत्र जारी कर किया जाता है।
  •         निवारक और सहायक दोनों तरह का है।
  •          खिलाफ जारी किया जा सकता है: न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के खिलाफ
  •          1991 सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया: प्रशासनिक प्राधिकरणों के खिलाफ भी जारी किया जा सकता है – जब यह व्यक्ति के अधिकार पर प्रभाव डालता है।
  •         खिलाफ नहीं: विधायी निकायों + निजी व्यक्ति या इकाई के खिलाफ
 

 

अधिकार पृच्छा

  •          अर्थ: “प्राधिकृत या वारंट के द्वारा”
  •          न्यायलय द्वारा, किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक कार्यालय में दायर अपने दावे की जांच के लिए जारी किया जाता है।
  •         व्यक्ति द्वारा लोक कार्यालय के अवैध अनाधिकार ग्रहण करने को रोकता है।
  •          सार्वजनिक कार्यालयों के मामले में, जब संवैधानिक हो।
  •          जारी नहीं किया जा सकता है: मंत्रिस्तरीय कार्यालय या निजी कार्यालय।
  •          किसी भी इच्छुक व्यक्ति द्वारा जारी की जा सकती है, जरूरी नहीं कि पीडित व्यक्ति द्वारा।

 

 

 

 

अनुच्छेद 33

अनुच्छेद 33: संसद को सशस्त्र बलों, अर्ध-सैन्य बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों और अन्य बलों के मूल अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 33 के तहत कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को है न कि राज्य विधान मंडलों को

इस तरह के संसद द्वारा बनाए गए कानून को किसी न्यायलय में किसी मूल अधिकार के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है।

अनुच्छेद 33 के तहत निर्मित संसदीय कानून, जहां तक मूल अधिकारों को लागू करने का संबंध है, कोर्ट मार्शल (सैन्य कानून के तहत स्थापित अधिकरण) को उच्चतम न्यायलय या उच्च न्यायलयों के रिट अधिकार क्षेत्र से बाहर करता है।

 

 

 

 

 

अनुच्छेद 34

  •          अनुच्छेद 34जब भारत में कहीं भी मार्शल लॉ लागू है, तब अनुच्छेद 34 मूल अधिकारों पर प्रतिबंध के लिए प्रावधान करता है।
  •         यह संसद को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी सरकारी कर्मचारी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य की व्यवस्था को बरकरार रखे या पुनर्निर्मित करे संसद किसी मार्शल लॉ क्षेत्र में जारी आदेश को वेधता प्रदान करता है।
  •         मार्शल लॉ का तात्पर्य है – सैन्य शासन – सेना द्वारा सामान्य कानून और सरकार के निलंबन से है।
  •          मार्शल लॉ की अवधारणा को अंग्रेजी कानून से लिया गया है।
  •         अभिव्यक्ति “मार्शल लॉ” (सैन्य शासन) को संविधान में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है।
  •         अनुच्छेद 34 के तहत भारत के किसी भी क्षेत्र में मार्शल लॉ घोषित किया जा सकता है।
 

 

 

 

 

 

 

अनुच्छेद  35

  •         अनुच्छेद 35कुछ विशेष मूल अधिकारों को प्रभावी करने के लिए केवल संसद को ही कानून बनाने की शक्ति देता है न कि राज्य विधान मंडलों को।
  •         यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि मूल अधिकारें और दंड व उनकी प्रकृति के संबंध में पूरे भारत में एकरूपता है।
  •          संसद के पास (राज्य विधानमंडलों के पास नहीं) कानून बनाने की शक्ति होगी: कुछ रोजगार या नियुक्तियों के लिए निवास कि व्यवस्था (अनुच्छेद  16) + उच्चतम न्यायलय या उच्च न्यायलयों को छोड़कर अन्य न्यायलयों को मूल अधिकारों के निर्देश, आदेश, रिट जारी करने के लिए सशक्त बनाना (अनुच्छेद 32) + सशस्त्र बलों, पुलिस बलों, आदि के सदस्यों के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 33) + किसी भी सरकारी कर्मचारी या किसी अन्य व्यक्ति को किसी भी क्षेत्र में मार्शल लॉ के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए क्षतिपूर्ति देना (अनुच्छेद 34)
  •          संसद के पास (राज्य विधानमंडलों के पास नहीं): मूल अधिकारों के तहत दंडित करने का कानून बनाने के लिए अधिकार होगा। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17) + मानव में दुर्व्यापार और बलात श्रम का निषेध (अनुच्छेद 23)
  •          अनुच्छेद 35 उपर्यक्त मामलों पर कानून बनाने के लिए संसद की शक्ति सुनिश्चित करता है, हालांकि इनमे से कुछ अधिकार राज्य विधानमंडलों (राज्य सूची) के दायरे में भी होते हैं।

 

 

सेना विधि राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)
यह केवल मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। यह न केवल मौलिक अधिकारों बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों, केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व और विधायी शक्तियों के वितरण को प्रभावित करता है तथा संसद के कार्यकाल को बढ़ा भी सकता है।
यह सरकार और अदालतों को निलंबित करता है। सेना द्वारा सिविल प्रशासन का संचालन किया जाता है। यह सरकार और अदालतों को निलंबित नहीं करता है।
किसी भी क्षेत्र में कानून व्यवस्था को सुधारने हेतु सेना विधि को लागू किया जाता है, जो किसी कारण खराब हो गयी होती है।  इसे केवल तीन आधारों पर लागू किया जा सकता है-युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह।
इसे देश के किसी भाग या क्षेत्र में लगाया जाता है। इसे पूरे देश में या इसके किसी भी हिस्से में लगाया जाता है।
संविधान में इसका कोई विशेष प्रावधान नहीं है अर्थात भारतीय संविधान में सेना विधि (मार्शल ला) को परिभाषित नहीं किया गया है। यह संविधान में निहित रूप में है। संविधान में इसका विशिष्ट और विस्तृत प्रावधान है। यह संविधान में स्पष्ट रूप से  है।

 

मूल अधिकारों के अपवाद
  • संपदाओं आदि के अर्जन हेतु प्रावधान करने वाली विधियों की व्यावृत्ति(बचाव)
  • कुछ विधियों व विनियमों का विधिमान्यीकरण: नौवीं अनुसूची
  • कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति(बचाव)
मूल अधिकारों की आलोचना मूल अधिकारों का महत्व
अत्यधिक(व्यापक) सीमाएं + कोई सामाजिक और आर्थिक अधिकार नहीं + स्पष्टता का अभाव + स्थायित्व का अभाव + आपातकाल के दौरान स्थगन+ महंगा उपचार + निवारक निरोध + प्रतिमान दर्शन नहीं (No consistent philosophy) देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला(Bedrock) + व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रक्षक + व्यक्ति की गरिमा और सम्मान सुनिश्चित करना + भारतीय राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि को मजबूत करना + अल्पसंख्यक के हितों की रक्षा करना।

 

भाग III  के अतिरिक्त अधिकार
  • विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना – अनुच्छेद 265 (भाग XII)
  • विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना – अनुच्छेद 300क (भाग XII)
  • भारत के राज्यक्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद 301 (भाग XIII)
मूल अधिकार राज्य की नीति-निदेशक तत्व मूल कर्तव्य
  •          वाद योग्य।
  •          राजनीतिक न्याय।
  •          कानूनी या विधिक निर्बंधन।
  •          व्यक्तिगत।
  •          मूल अधिकार स्वयं प्रवर्तित हैं।
  •         यदि कोई कानून मूल अधिकार का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।

 

  •          वाद योग्य नहीं
  •         आर्थिक और सामाजिक न्याय
  •          कानूनी या विधिक निर्बंधन नहीं
  •         समाजवादी
  •          स्वयं प्रवर्तित नहीं हैं
  •          यदि कोई कानून डीपीएसपी का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित नहीं कर सकता है
  •          केवल कर्तव्य के रूप में(विधिक बाध्यता नहीं)
  •          कानूनी या विधिक निर्बंधन नहीं
  •          स्वयं प्रवर्तित नहीं हैं
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