उत्तरी मैदान

उत्तरी मैदान

 

भारत के उत्तर में स्थित विशाल मैदान हिमालय के बाद मध्य अक्षांश पर स्थित एक उपजाऊ भूमि हैं| ये अपेक्षाकृत हाल की उत्पत्ति हैं और हिमालय से निकलने वाली एवं तेज गति से बहने वाली नदियों द्वारा लाए गए गाद से निर्मित होती हैं।

उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र शिवालिक के दक्षिण में स्थित है, जो हिमालयी फ्रंटल फॉल्ट (HFF) द्वारा पृथक होता है। प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र इसकी दक्षिणी सीमा बनाती है। पूर्व में, मैदानों की सीमा पूर्वांचल की पहाड़ियों से लगती है। उत्तरी मैदान भारत की सबसे कम उम्र की भौगोलिक विशेषता है।

 

उत्तरी मैदानों का विकास

ऐसा माना जाता हैं की हिमालय के निर्माण के साथ ही उत्तरी मैदान का निर्माण प्रारभं हो गया था|

  • टेथिस सागर में हिमालय के उत्थान के कारण, भारतीय प्रायद्वीप का उत्तरी भाग जलमग्न हो गया था और एक विशाल घाटी का निर्माण हुआ।
  • यह घाटी उन नदियों की तलछट से भरा गया था जो उत्तर में पहाड़ों से और दक्षिण में प्रायद्वीप से उत्पन्न हुई थी।
  • हाल के समय में (करोड़ो वर्षों के बाद), तीन प्रमुख नदियों- सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के निक्षेपण कार्य, उत्कृष्टता पे प्रतीत होते हैं।.
  • परिणामस्वरूप, इस मैदान को भारत के गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान के रूप में भी जाना जाता है।.

 

उत्तरी मैदानों की मुख्य विशेषताएं:
  • भारत का उत्तरी मैदान तीन नदी तंत्र, अर्थात सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित है।
  • उत्तर का मैदान दुनिया का सबसे बड़ा जलोढ़ क्षेत्र है।
  • यह सिंधु के मुहाने से गंगा के मुहाने तक लगभग 3,200 किमी तक फैला हुआ है।
  • इन मैदानों की औसत चौड़ाई 150 और 300 किमी है। सामान्य तौर पर, उत्तरी मैदानी इलाकों की चौड़ाई पूर्व से पश्चिम तक (असम में 90-100 किमी और पंजाब में लगभग 500 किमी) तक बढ़ जाती है।
  • उत्तरी सीमा को शिवालिक द्वारा अच्छी तरह से चिह्नित किया जाता है और दक्षिणी सीमा को प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी किनोरों के साथ |
  • पश्चिमी भाग सुलेमान और कीर्थार श्रेणियों द्वारा विभाजित है।
  • जलोढ़ क्षेत्र की गहराई अलग-अलग स्थांनो पर अलग –अलग होती है| जलोढ़ की अधिकतम गहराई पृथ्वी की सतह के नीचे की चट्टानों में लगभग 6,100 मीटर है।
  • इस समतल मैदान की अत्यधिक क्षैतिजता इसकी मुख्य विशेषता है।
  • इसकी सामान्य ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 200 मीटर है, सबसे अधिक ऊँचाई अंबाला के समीप समुद्र तल से 291 मीटर है (यह ऊँचाई सिंधु नदी तंत्र और गंगा नदी तंत्र के बीच जल विभाजक का काम करती है)।
  • भौतिक भूदृश्य, नदी का किनारा, तटबंध आदि(नदी के प्रवाह) से टूट जाते है।
  • बाढ़प्रवण क्षेत्र – किसी नदी घाटी का वह हिस्सा होता है, जो नदी  प्रणाली के समीप होता है , तथा बाढ़ के समय जिसके ऊपर से जल की धारा बहती है।
  • तटबंध – एक उठा हुआ किनारा होता है , जो नदी प्रणाली को प्रवाहित करता है और  मुख्त: बाढ़ प्रवण क्षेत्र के स्तर से ऊपर रहता है।
  • नदी का उच्च उध्वाधर किनारा (Bluff) – जब कोई नदी किसी खड़ी चट्टान के किनारे को स्पर्श करती हुई तिरछा काटती है। तब नदी का उच्च खड़ा किनारा अक्सर पिछले बाढ़ के मैदान के किनारे को दर्शाती हुईं प्रतीत होती है|

 

उत्तरी मैदान का भौतिक विभाजन

भारत के विशाल उत्तरी मैदान को इनके उच्च्वाच के आधार पर  निम्नलिखित उपविभागों में विभाजित किया जाता है:

  1. भाबर के मैदान|
  2. तराई क्षेत्र के मैदान|
  3. भांगर के मैदान|
  4. खादर के मैदान
  5. डेल्टा मैदान

भाबर

भाबर के  मैदान जम्मू से असम तक शिवालिक के दक्षिण में स्थित है

  • यह गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान का एक संकीर्ण, पारगम्य, सबसे उत्तरी भाग है
  • यह लगभग 8-16 किमी चौड़ा है जो शिवालिक के निचले क्षेत्रों (जलोढ़) में पूर्व-पश्चिम दिशा में समानांतर विस्तृत है
  • सिंधु से तीस्ता तक इनमे निरंतरता देखी जा सकती हैं।
  • हिमालय से निकलने वाली नदियाँ निचले क्षेत्रों के साथ-साथ जलोढ़ पंखे के रूप में अपना भार(गाद\निक्षेपण) जमा करती हैं।
  • इन जलोढ़ पंखो (अक्सर कंकड़ वाली मिट्टी) द्वारा ही मुख्त: भाबर बेल्ट का निर्माण होता है।
  • संरंध्रता के कारण भाबर क्षेत्र में आने पर धाराएँ प्रमुखतालुप्त हो जाती हैं
  • इसके बाद, इस क्षेत्र को बारिश के मौसम को छोड़कर सूखी नदी मार्गों द्वारा अलग किया जाता है
  • भाबर बेल्ट पूर्व में संकरा और पश्चिम में चौड़ा है।

यह क्षेत्र अपनी झरझरा प्रकृति और कंकड़ जड़ी चट्टानों की उपस्थिति के कारण खेती के लिए उपयुक्त नहीं है; इस बेल्ट में केवल विशाल पेड़ों वाले विशाल वृक्ष ही फलते-फूलते हैं।

तराई

  • तराई एक सूखा, नम और घने जंगल वाला क्षेत्र है इसके  दक्षिण में समानांतर भाभर का क्षेत्र चौड़ा पाए जाते है।
  • तराई लगभग 15-30 किमी चौड़ा हैं।
  • इस बेल्ट में भाबर बेल्ट की भूमिगत धाराएँ बहती हैं।
  • तराई पूर्वी हिस्से में पश्चिम की तुलना में अधिक विभाजित प्रतीत होती है क्योंकि पूर्वी भागों में  तुलनात्मक रूप से अधिक वर्षा होती है।
  • तराई की मिट्टी गाद-भरी और नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर होती है लेकिन इसमें प्रमुख्त: फॉस्फेट की कमी पाई जाती है|
  • आजकल हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, और उत्तर प्रदेश में तराई क्षेत्र को खेती के लिए मंजूरी दे दी गई है क्योंकि यह खाद और कार्बनिक पदार्थों में समृद्ध है।
  • यह गेहूं, चावल, मक्का, गन्ना आदि की खेती के लिए उपर्युक्त है|

भांगर

  • भांगर नदी के किनारे पुराने जलोढ़ हैं जो बाढ़प्रवण क्षेत्रों की तुलना में अधिक ऊंचे होते हैं
  • ऊंचाई वाले भागो को नियमित रूप से(चुना –पत्थर) कैल्केरियस सॉलिडेशंस (चूने के नोडल्स के बेड) के द्वारा भरा जाता है, जिन्हें ‘कंकर’ के रूप में भी जाना जाता है।
  • मुख्य रूप से शुष्क क्षेत्रों में, भांगर नमकीन और क्षारीय छोटे पथों(way) को प्रदर्शित करता है जिन्हें ‘रेह ‘, कल्लर’ या ‘भूर’ ’के नाम से जाना जाता है। रेह क्षेत्रों में हाल के दिनों में सिंचाई में वृद्धि हुई है (केशिका क्रिया सतह पर लवण लाती है)।?
  • बंगाल के डेल्टा क्षेत्र में ‘बरिंड क्षेत्र’ और मध्य गंगा और यमुना दोआब में ‘भुर संरचनाओं’ भांगर के क्षेत्रीय रूपांतर हैं।
  • भांगर में गैंडे, दरियाई घोड़े, हाथी और आगे? जैसे जीवों के जीवाश्म हैं।
  • इस क्षेत्र में दोमट मिट्टी पाए जाते है और आम तौर पर यह गहरे रंग की होती है।

खादर

  • खादर नए जलोढ़ से बना है और नदी के किनारे बाढ़ प्रवण का निर्माण करता है।
  • हर साल नदी की बाढ़ से जलोढ़ की एक नई परत का निर्माण होता है|
  • जो इसको उत्तरी मैदानों  का  सबसे उपजाऊ भाग  बनाता है |
  • यह प्रमुख्त: रेतीले और दोमट मिट्टी होते हैं| जिसमे सोखने, अधिक प्रक्षालित और अस्थिर होने की प्रवत्ति होती है|
  • पंजाब में, खादर के समृद्ध बाढ़ के मैदानों को स्थानीय रूप से ‘बेटलैंड्स’ या ‘बेट्स’ के रूप में जाना जाता है।
  • पंजाब-हरियाणा के मैदानी इलाकों में नदियाँ खाड़ की विस्तृत बाढ़ के मैदान हैं, जिन्हें स्थानीय तौर पर धाय(Dhaya=Heavily gullied bluffs) के नाम से जाना जाता है। ये 3 मीटर तक ऊंचे होते हैं।

 

उत्तरी मैदानों के क्षेत्रीय वितरण

पंजाब का मैदान

उत्तर पश्चिमी भारत में पंजाब के मैदान बड़े जलोढ़ मैदान हैं। इसका क्षेत्रफल लगभग 38,300 वर्ग मील (99,200 वर्ग किमी) है और इसमें शाहदरा अंचल को छोड़कर पंजाब , हरियाणा और दिल्ली के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं।

यह उत्तर में शिवालिक रेंज, पूर्व में यमुना नदी, दक्षिण में राजस्थान राज्य के शुष्क क्षेत्र, और उत्तर और दक्षिण-पश्चिम में क्रमशः रावी और सतलज नदियों से घिरा हुआ है।

 

यह मैदान सिंधु तंत्र की पांच प्रमुख नदियों द्वारा आकार लेता है

  • मैदान मुख्य रूप से ‘दोआब’ से बना है –(जिसको

दो नदियों के बीच की क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है|

  • नदियों द्वारा निक्षेपण प्रक्रिया इन दोआब में शामिल हो कर एक सजातीय स्वरूप लेता है।
  • पंजाब का तात्पर्य “द लैंड ऑफ फाइव रिवेर्स” के साथ बहने वाली नदियों से है: झेलम, चिनाब, रावी, सतलज और ब्यास|
  • इस समतल क्षेत्र की औसत ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 250 मीटर ऊपर है|
  • पंजाब -हरियाणा मैदान की पूर्वी सीमा को दिल्ली-अरावली पर्वतश्रेणी द्वारा पृथक किया जाता है|
  • सतलुज नदी के दक्षिण में, पंजाब का मालवा का मैदान स्थित है|
  • मैदान का भूगर्भिक उद्गम पैलियोजेन और नियोजीन है (यानी, लगभग 65 और6 मिलियन वर्ष पूर्व) – दक्षिण में इसकी सतह – इसकी सतह का निर्माण मेन्ड्रा धाराओं की सिल्टिंग क्रिया द्वारा हुआ है।
  • यह मैदान थोड़ा ऊँचा है, जो उत्तर पूर्व में 2,140 फीट (650 मीटर) और दक्षिण पूर्व में 700 फीट (200 मीटर) है। रावी, ब्यास, सतलज और यमुना बारहमासी नदियाँ हैं।
  • दक्षिण-पूर्व में मुख्त: उपोष्णकटिबंधीय कंटीले जंगल हैं, और साथ ही इसमें शुष्क पर्णपाती वन भी पाए जाते हैं।
  • कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, और अधिकांशत: मैदानी क्षेत्र पर खेती की जाती है;जिसपर अनाज, कपास, गन्ना, और तिलहन उगाए जाते हैं। अधिकांश क्षेत्र सिंचाई नहरों से भरा हुआ है।
  • दिल्ली, अमृतसर, लुधियाना, जालंधर और चंडीगढ़ में केंद्रित बड़े पैमाने पर उद्योग विभिन्न प्रकार के सामानों का उत्पादन करते हैं, जिनमें कपड़ा, साइकिल पार्ट्स, मशीन टूल्स, कृषि उपकरण, खेल के सामान, रोज़िन, तारपीन और वार्निश शामिल हैं।

गंगा का मैदान

  • यह दिल्ली से कोलकाता (लगभग75 लाख वर्ग किमी) तक फैले भारत के विशाल मैदान की सबसे बड़ी क्षेत्र है|
  • गंगा अपनी सहायक नदियों की विशाल संख्या के साथ इस मैदान में जल निकासी करती है। हिमालय में उत्पन्न होने वाली ये धाराएँ पहाड़ों से बड़ी मात्रा में जलोढ़ लाती हैं और इस व्यापक मैदान को बनाने के लिए इसे यहाँ जमा करती हैं|
  • चंबल, बेतवा, केन, सोन आदि प्रायद्वीपीय नदियों ने गंगा नदी प्रणाली में शामिल होकर इस मैदान के विकास में योगदान दिया है |
  • नदियाँ गंगा के निचले क्षेत्रों में धीमी गति से बहती हैं जिसके कारण इस क्षेत्र को स्थानीय क्षेत्र से अलग किया जाता है जैसे कि तटबंध, नदी के किनारे, गोखुर झील, दलदल, घाटी इत्यादि।
  • लगभग सभी नदियाँ अपने मार्गों को बदलते रहती हैं जिससे इस क्षेत्र में बार-बार बाढ़ आती है|
  • इस संबंध में कोसी नदी बेहद प्रमुख है। इसे लंबे समय तक बिहार का ‘दुःख'(शोक ) कहा जाता रहा है।
  • उत्तरी राज्य हरियाणा, दिल्ली, यूपी, बिहार, पूर्व में झारखंड और पश्चिम बंगाल का हिस्सा गंगा के मैदान में स्थित है।
  • गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा: दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा। तटीय डेल्टा का एक बड़ा हिस्सा सुंदरबन नामक ज्वारीय जंगलों द्वारा सुरक्षित है।
  • सुंदरबन, इस ग्रह पर सबसे बड़े मैंग्रोव दलदल है जिसका नामकरण इसमें वृहद् पैमाना पर पाए जाने वाले सुन्दरी नामक वृक्ष पर हुआ है जो दलदली भूमि में अच्छी तरह से बढ़ता है। यह रॉयल टाइगर और मगरमच्छों का प्राकृतिक निवास स्थान है।

गंगा के मैदानी इलाकों के क्षेत्रीय विभाजन:

  • रोहिलखंड मैदान
  • अवध के मैदान
  • मिथिला का मैदान
  • मगध का मैदान।

ब्रह्मपुत्र मैदान

  • इसे ब्रह्मपुत्र घाटी या असम घाटी या असम मैदान के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि ब्रह्मपुत्र घाटी का अधिकांश हिस्सा असम में स्थित है।
  • इसकी पश्चिमी सीमा भारत-बांग्लादेश सीमा के साथ-साथ निचले गंगा मैदान की सीमा से बनती है। इसकी पूर्वी सीमा पूर्वांचल की पहाड़ियों द्वारा बनती है।
  • यह ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के निक्षेपी कार्यों द्वारा विकसित निक्षेपित मैदान है।
  • उत्तरी भाग से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की अनेक सहायक नदियां जलोढ़ पंख का निर्माण करती है।
  • इसलिए, सहायक नदियां कई चैनलों/नालों में विभाजित हो जाती है और इस प्रकार नदी विसर्पों का निर्माण होता है जो अंत मे गोखुर झील के रूप मे बदल जाती है।
  • इस क्षेत्र में विशाल दलदली इलाके हैं। मोटे जलोढ़ मलबे के द्वारा निर्मित जलोढ़ पंख के कारण तराई या अर्ध-तराई क्षेत्र का निर्माण होता है।
  • ब्रह्मपुत्र की  माजुली नदी द्वीप विश्व में सबसे बड़ा नदी तटीय द्वीप  है
  • माजुली द्वीप समहू को भारतीय संसकृति मंत्रालय द्वारा यूनेस्को के विश्व धोरहर स्थल के लिए नामित किया गया था परन्तु 2020 की सूची में इसको शामिल नहीं किया गया हैं|

 

उत्तरी मैदानों का महत्व
  • वर्तमान में देश की इस एक चौथाई भूमि पर आधी आबादी निवास करती है।
  • उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, सपाट सतह, धीमी गति से चलने वाली बारहमासी नदियां और आदर्श वातावरण कृषि गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं ।
  • इन मैदानों की अवसादी चट्टानों में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के निक्षेप भी मिले है।
  • इन नदियों में बहुत कम ढाल होता हैं जो इन्हे लंबी दूरी तक जाने में मदद करता हैं ।
  • सिंचाई के व्यापक उपयोग द्वारा पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग भारत के अन्न भंडार के रूप मे उभरे है (प्रेयरी को दुनिया के अन्न भंडार के रूप में जाना जाता है)।
  • थार रेगिस्तान को छोड़कर पूरे मैदानी क्षेत्र में सड़कों और रेलवे का एक गहरा नेटवर्क है जिसने औद्योगीकरण और शहरीकरण की अपार संभावनाओं को प्रेरित किया है ।
  • सांस्कृतिक पर्यटन: गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों के किनारे कई धार्मिक स्थल स्थित हैं जो हिंदुओं, बौद्धों और जैन धर्म मे बहुत मान्य हैं। उदाहरण के लिए: हरिद्वार, वाराणसी, इलाहाबाद, गया, अमृतसर।

भारतीय द्वीप समूह

भारत में कुल 247 द्वीप हैं जिनमें से 204 द्वीप बंगाल की खाड़ी में और 43 अरब सागर में स्थित हैं। इसके अलावा मन्नार की खाड़ी में भी कुछ प्रवाल द्वीप  समूह मौजूद है।

भारत के प्रमुख द्वीप समूह –

  • बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
  • अरब सागर में लक्षद्वीप द्वीप समूह।

बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार द्वीप समूह में कठोर ज्वालामुखीय चट्टानें पायी जाती हैं

जबकि लक्षद्वीप द्वीप समूह प्रवालों द्वारा बने हैं। मध्य अंडमान निकोबार द्वीप समूह भारत का सबसे बड़ा द्वीप है।

भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु निकोबार द्वीप में स्थित है, जिसे इंदिरा प्वाइंट के नाम से जाना जाता है।  जिसे पूर्व में पिग्मेलियन पॉइंट और पार्सन्स पॉइंट के नाम से जाना जाता था, यह 2004 की सुनामी के बाद जलमग्न  हो गया है।

 

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

अंडमान निकोबार द्वीप समूह का निर्माण भारतीय प्लेट और बर्मा माइनर प्लेट (यूरेशियन प्लेट का हिस्सा) के बीच टकराव के कारण हुआ था (हिमालय के निर्माण के समान(समय )) । यह अराकान  योमा पर्वत शृंखला (म्यांमार) का दक्षिणी विस्तार हैं।( इसको हिमालय के भाग के रूप में भी जाना जाता हैं|)

  • यह द्वीप समूह 265 बड़े और छोटे द्वीपों से बना हुआ है (203 अंडमान द्वीप + 62 निकोबार द्वीप)।
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह 6 ° 45 ‘N से 13 ° 45’ N और 92 ° 10 ‘E से 94 ° 15’ E तक फैला हुआ है | जो लगभग 590 किमी में स्थित है |
  • अंडमान द्वीप समूह तीन मुख्य द्वीपों (उत्तर, मध्य और दक्षिण) में बंटा हुआ है।
  • डंकर पैसेज दक्षिण अंडमान से लिटिल अंडमान को अलग करता है।
  • 10 डिग्री चैनल उत्तर में ग्रेट अंडमान द्वीप समूह और दक्षिण में निकोबार समूह को अलग करता है।
  • अंडमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर दक्षिण अंडमान में स्थित है।
  • निकोबार द्वीप समूह में, ग्रेट निकोबार सबसे बड़ा है और यह इंडोनेशिया के  सुमात्रा द्वीप से केवल 147 किमी दूर(पर स्थित) है।
  • ग्रेट निकोबार सबसे दक्षिणी द्वीप है।
  • कार निकोबार सबसे उत्तरी द्वीप है।
  • इन द्वीपों का बड़ा हिस्सा तृतीय युग के बलुआ पत्थर, चूना पत्थर और शेल से बना हैं जो यहाँ क्षारीय और अतिक्षारीय ज्वालामुखियों पर मिलते है।
  • पोर्ट ब्लेयर के उत्तर में बैरेन द्वीप (भारत में केवल सक्रिय ज्वालामुखी) और नार्कोंडैम  द्वीप (एक विलुप्त या निष्क्रिय ज्वालामुखी), ज्वालामुखी द्वीप हैं।
  • द्वीपों का एक हिस्सा प्रवाल भित्तियों से सीमा बनाता है। उनमें से कई घने जंगलों से ढके हुए हैं और अधिकांश द्वीप पर्वतीय हैं।
  • उत्तर अंडमान में सैडल चोटी (737 मीटर) सबसे ऊंची  चोटी है।

 

लक्षद्वीप द्वीप समूह

लक्षद्वीप द्वीप एक  प्रवाल द्वीप हैं। ये द्वीप रीयूनियन  हॉटस्पॉट ज्वालामुखी श्रृंखला का हिस्सा है।

  • अरब सागर में द्वीपों की तीन श्रेणियां हैं।
    • अमीनदीव द्वीप (अमिनी, केल्टन, चेतलत,

कदमत, बिट्रा और पेरुमल पार छह मुख्य द्वीपों से  मिलकर बना है)।

  • लैकाडिव द्वीप समूह (एंड्रोट, कल्पेनी, कावारत्ती, पिट्टी और सुहेली पार – पांच प्रमुख द्वीपों से मिलकर बना है)
  • मिनीकॉय
  • वर्तमान में इन द्वीपों को सामूहिक रूप से लक्षद्वीप के नाम से जाना जाता है।
  • लक्षद्वीप द्वीप 25 छोटे द्वीपों का एक समूह है|
  • वे केरल तट से लगभग 200-500 किमी दक्षिण-पश्चिम में व्यापक रूप से बिखरे हुए हैं।
  • अमीनदीव द्वीप सबसे उत्तरी जबकि मिनीकॉय द्वीप सबसे दक्षिणी द्वीप है।
  • सभी प्रवाल द्वीप प्रमुख्त: छोटे द्वीप होते  हैं(एटोल पर प्रवाल निक्षेपण) और ये भित्तियों की सीमा से घिरे हुए है।
  • एंड्रोट (4.9 वर्ग किमी) सबसे बड़ा द्वीप है। मिनिकॉय (4.5 वर्ग किमी) दूसरा सबसे बड़ा द्वीप है।
  • अधिकतर द्वीपों की ऊंचाई कम है और जो  समुद्र तल से पांच मीटर से अधिक ऊंचे  भी नहीं है (समुद्र के स्तर में वृद्धि होने पर जलमगन होना के दृष्टिकोण से  बेहद संवेदनशील)।
  • इनकी स्थलाकृति सपाट है और स्थलाकृतिक विशेषताएँ जैसे की पहाड़ियाँ, धाराएँ, घाटियाँ आदि अनुपस्थित हैं।

 

अन्य द्वीप

इन दो समूहों के अलावा भारत-गंगा डेल्टा (ये द्वीप कम और डेल्टा का हिस्सा अधिक हैं) और भारत और श्रीलंका के बीच स्थित द्वीप  हैं (राम सेतु  या एडम ब्रिज के  अवशेष; जलमग्न के कारण गठित)।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण द्वीप:

  1. माजुली– यह असम में है । यह:
    • दुनिया का सबसे बड़ा ताजा पानी (ब्रह्मपुत्र नदी) का द्वीप है ।
    • भारत का पहला द्वीपीय जिला है।
  2. साल्सेट द्वीप: यह भारत का सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है। मुंबई शहर इस द्वीप पर स्थित है।
  3. श्री हरिकोटा: यह एक बाधा/बैरियर द्वीप है। इस द्वीप पर इसरो का उपग्रह प्रक्षेपण स्टेशन है।
  4. आलियाबेट: भारत की पहला अपतटीय तेल कुएं का स्थान(गुजरात) है; जोकि भावनगर से लगभग 45 किमी दूर है, और यह  खंभात की खाड़ी में स्थित  है।
  5. न्यू मूर द्वीप: यह गंगा डेल्टा में है।   इसे  पुरबाशा द्वीप के नाम से भी जाना जाता है। यह  सुंदरबन डेल्टा क्षेत्र में स्थित है और यह भारत और बांग्लादेश के बीच विवाद का कारण था । 2010 में ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के बढ़ते जलस्तर से यह पूरी तरह जलमग्न हो गया।
  6. पाम्बन  द्वीप- भारत और श्रीलंका के बीच स्थित है।
  7. अब्दुल कलाम द्वीप: ओड़ीसा तट के पास व्हीलर द्वीप का नाम बदलकर 2015 में अब्दुल कलाम द्वीप कर दिया गया। यह बंगाल की खाड़ी में मिसाइल प्रक्षेपण स्टेशन है। पृथ्वी मिसाइल का पहला सफल( भूमि-से-भूमि परीक्षण) परीक्षण यही से किया गया था (30 नवम्बर   1993)|

भारतीय रेगिस्तान

भारतीय रेगिस्तान को थार रेगिस्तान या ग्रेट इंडियन डेजर्ट के नाम से भी जाना जाता है।

स्थान और सीमा

  • स्थान – अरावली पहाड़ियों के उत्तर-पश्चिम में।
  • यह पश्चिमी राजस्थान पर आच्छादित है और पाकिस्तान के निकटवर्ती हिस्सों तक फैला हुआ है

भूवैज्ञानिक इतिहास

  • मेसोजोइक युग के दौरान, यह क्षेत्र समुद्र के नीचे था।  आंकल वुड फॉसिल पार्क में उपलब्ध सबूतों और जैसलमेर के पास ब्रह्मसर के  आस-पास के सामुद्रिक क्षेत्रों से प्राप्त निक्षेपण के आधार पर इसकी पुष्टि की जा सकती है।
  • नदियों के सूखे नदीतल (जैसे सरस्वती) की उपस्थिति से पता चलता है कि यह क्षेत्र कभी उपजाऊ था।
  • भूवैज्ञानिक रूप से, रेगिस्तानी क्षेत्र प्रायद्वीपीय पठार क्षेत्र का एक हिस्सा है, लेकिन सतह पर यह एक निक्षेपित मैदान की तरह लगता है

भारतीय रेगिस्तान की विशेषताएं

  • इस रेगिस्तान को मरुस्थली (मृत भूमि) कहा जाता है क्योंकि इस क्षेत्र में कम जलवायु के साथ शुष्क जलवायु उपस्थित है। रेगिस्तान का पूर्वी भाग चट्टानी है, जबकि इसका पश्चिमी भाग रेत के टीलों से ढका हुआ है।
  • बागर:- बागर  अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र में है जो अरावली के पश्चिम में है। बागर  में रेत की पतली परत है। यह दक्षिण में लूनी द्वारा सिंचित है जबकि उत्तरी क्षेत्र में कई नमक झीलें हैं।
  • राजस्थान बागर क्षेत्र में विभिन्न छोटी मौसमी नदियां/ धाराएँ हैं जो अरावली से शुरू होती हैं। ये धाराएँ रोही नामक कुछ उपजाऊ क्षेत्र में कृषि करने मे सहायता करती हैं ।
  • यहां तक कि सबसे महत्वपूर्ण नदी लूनी एक मौसमी धारा है। लूनी अजमेर के करीब अरावली शृंखला की पुष्कर घाटी में शुरू होती है और दक्षिण पश्चिम की ओर कच्छ के रण में बहती हुए  विलुप्त हो जाती है।
  • लूनी के उत्तरी क्षेत्र को थली या रेतीले मैदान के रूप में जाना जाता है ।
  • कुछ ऐसी धाराएं हैं जो कुछ दूरी तक बहने के बाद गायब हो जाती हैं और एक झील या प्लाया जैसे सांभर झील में शामिल होकर अंतर्देशीय जल प्रणाली का एक विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं| ।
  • झीलों और प्लाया में खारा पानी होता है जो नमक का मूलभूत स्रोत है।

अच्छी तरह से स्पष्ट रेगिस्तानी भूमि विशेषताएँ:

  • रेत के टीले: पवन द्वारा रेत एवं बालू के निक्षेप से निर्मित टीलों को बालुका स्तूप अथवा टिब्बा कहते हैं। भौतिक भूगोल में, एक टिब्बा एक टीला या पहाड़ी है, जिसका निर्माण वायू प्रक्रियाओं द्वारा होता है। इन स्तूपो के आकार में तथा स्वरुप में बहुत विविधता देखने को मिलती हैं। टिब्बा विभिन्न स्वरूपों और आकारों में निर्मित हो सकता है और यह सब वायु की दिशा और गति पर निर्भर करता है। (बरचन ) अर्धचंद्रा कारबालू का टीला- इसका वक्र प्रमुख हवा की दिशा से दूर होता है और समकोण पर निर्मित होता है |
  • अनुदैर्ध्य टिब्बा – – पवन के रेत के समांतर बनने वाला एक रेत का टीला)
  • मशरूम चट्टाने
  • स्थानांतरण टिब्बा ( इन्हे स्थानीय रूप से धरियन कहा जाता है)
  • मरूद्यान (ज्यादातर इसके दक्षिणी भाग में)

 

 

 

 

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